Lafzullah

Hintçe Meal — Mevlânâ Azîzü'l-Hak el-Umerî — Tekvir 81:1 – Nas 114:6

Author / source: Mevlânâ Azîzü'l-Hak el-Umerî — QuranEnc.com (v1.1.5)

Contents
  1. Tekvir 81:1
  2. Tekvir 81:2
  3. Tekvir 81:3
  4. Tekvir 81:4
  5. Tekvir 81:5
  6. Tekvir 81:6
  7. Tekvir 81:7
  8. Tekvir 81:8
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Tekvir 81:1

जब सूर्य लपेट दिया जाएगा।

Tekvir 81:2

और जब सितारे प्रकाश रहित हो जाएँगे।

Tekvir 81:3

और जब पर्वत चलाए जाएँगे।

Tekvir 81:4

और जब गाभिन ऊँटनियाँ छोड़ दी जाएँगी।

Tekvir 81:5

और जब जंगली जानवर एकत्रित किए जाएँगे।

Tekvir 81:6

और जब सागर भड़काए जाएँगे।[1] ——— [1] (1-6) इनमें प्रलय के प्रथम चरण में ब्रह्मांड में जो उथल-पुथल होगी, उसको दिखाया गया है कि आकाश, धरती और पर्वत, सागर तथा जीव जंतुओं की क्या दशा होगी। और माया मोह में पड़ा इनसान इसी संसार में अपने प्रियवर धन से कैसा बेपरवाह हो जाएगा। वन पशु भी भय के मारे एकत्र हो जाएँगे। सागरों के जल-प्लावन से धरती पर जल ही जल दिखाई देगा।

Tekvir 81:7

और जब प्राण मिला दिए जाएँगे।

Tekvir 81:8

और जब जीवित गाड़ी गई लड़की से पूछा जाएगा।

Tekvir 81:9

कि वह किस अपराध के कारण मारी गई?

Tekvir 81:10

तथा जब कर्मपत्र (आमाल नामे) फैला दिए जाएँगे।

Tekvir 81:11

और जब आकाश उधेड़ दिया जाएगा।

Tekvir 81:12

और जब जहन्नम दहकाई जाएगी।

Tekvir 81:13

और जब जन्नत क़रीब लाई जाएगी।

Tekvir 81:14

तो प्रत्येक प्राणी जान लेगा कि वह क्या लेकर आया है।[2] ——— [2] (7-14) इन आयतों में प्रलय के दूसरे चरण की दशा को दर्शाया गया है कि इनसानों की आस्था और कर्मों के अनुसार श्रेणियाँ बनेंगी। नृशंसितों (मज़लूमों) के साथ न्याय किया जाएगा। कर्म-पत्र खोल दिए जाएँगे। नरक भड़काई जाएगी। स्वर्ग सामने कर दिया जाएगा। और उस समय सभी को वास्तविकता का ज्ञान हो जाएगा। इस्लाम के उदय के समय अरब में कुछ लोग पुत्रियों को जन्म लेते ही जीवित गाड़ दिया करते थे। इस्लाम ने नारियों को जीवन प्रदान किया। और उन्हें जीवित गाड़ देने को घोर अपराध घोषित किया। आयत संख्या 8 में उन्हीं नृशंस अपराधियों को धिक्कारा गया है।

Tekvir 81:15

मैं क़सम खाता हूँ पीछे हटने वाले सितारों की।

Tekvir 81:16

चलने वाले, छिप जाने वाले तारों की।

Tekvir 81:17

और रात की (क़सम), जब वह आती और जाती है।

Tekvir 81:18

तथा सुबह की, जब वह रौशन होने लगे।

Tekvir 81:19

निःसंदेह यह (क़ुरआन) एक आदरणीय संदेशवाहक की लाई हुई वाणी है।

Tekvir 81:20

जो शक्तिशाली है, अर्श (सिंहासन) वाले के पास उच्च पद वाला है।

Tekvir 81:21

उसकी वहाँ (आसमानों में) बात मानी जाती है और बड़ा विश्वसनीय है।[3] ——— [3] (15-21) तारों की व्यवस्था गति तथा अँधेरे के पश्चात् नियमित रूप से उजाला की शपथ इस बात की गवाही है कि क़ुरआन ज्योतिष की बकवास नहीं। बल्कि यह ईश-वाणी है। जिसको एक शक्तिशाली तथा सम्मान वाला फ़रिश्ता लेकर मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आया। और अमानतदारी से इसे पहुँचाया।

Tekvir 81:22

और तुम्हारा साथी कोई दीवाना नहीं हैं।

Tekvir 81:23

और निश्चय उन्होंने उस (जिबरील) को स्पष्ट क्षितिज पर देखा है।

Tekvir 81:24

और वह परोक्ष (ग़ैब) की बातें बताने में कृपण नहीं हैं।[4] ——— [4] (22-24) इनमें यह चेतावनी दी गई है कि महा ईशदूत (मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जो सुना रहे हैं, और जो फ़रिश्ता वह़्य (प्रकाशना) लाता है, उन्होंने उसे देखा है। वह परोक्ष की बातें प्रस्तुत कर रहे हैं, कोई ज्योतिष की बात नहीं, जो धिक्कारे शौतान ज्योतिषियों को दिया करते हैं।

Tekvir 81:25

और यह (क़ुरआन) किसी धिक्कारे हुए शैतान की वाणी नहीं है।

Tekvir 81:26

फिर तुम कहाँ जा रहे हो?

Tekvir 81:27

यह तो समस्त संसार वालों के लिए एक उपदेश है।

Tekvir 81:28

उसके लिए, जो तुममें से सीधे मार्ग पर चलना चाहे।

Tekvir 81:29

तथा तुम कुछ नहीं चाह सकते, सिवाय इसके कि सर्व संसार का पालनहार अल्लाह चाहे।[5] ——— [5] (27-29) इन साक्ष्यों के पश्चात सावधान किया गया है कि क़ुरआन मात्र याद-दहानी है। इस विश्व में इसके सत्य होने के सभी लक्षण सबके सामने हैं। इनका अध्ययन करके स्वयं सत्य की राह अपना लो, अन्यथा अपना ही बिगाड़ोगे।

İnfitar 82:1

जब आकाश फट जाएगा।

İnfitar 82:2

तथा जब तारे झड़ जाएँगे।

İnfitar 82:3

और जब समुद्र बह निकलेंगे।

İnfitar 82:4

और जब क़बरें उलट दी जाएँगी।

İnfitar 82:5

तब प्रत्येक प्राणी जान लेगा, जो उसने आगे भेजा और जो पीछे छोड़ा।[1] ——— [1] (1-5) इनमें प्रलय के दिन आकाश ग्रहों तथा धरती और समाधियों पर जो दशा गुज़रेगी, उसका चित्रण किया गया है। तथा चेतावनी दी गई है कि हर एक की करतूत उसके सामने आ जाएगी।

İnfitar 82:6

ऐ इनसान! तुझे किस चीज़ ने तेरे उदार पालनहार से बहका दिया?

İnfitar 82:7

जिसने तेरी रचना की, फिर तुझे ठीक ठाक किया, फिर तुझे संतुलित बनाया।

İnfitar 82:8

जिस रूप में भी उसने चाहा, तुझे बना दिया।[2] ——— [2] (6-8) भावार्थ यह है कि इनसान की पैदाइश में अल्लाह की शक्ति, दक्षता तथा दया के जो लक्षण हैं, उनके दर्पण में यह बताया गया है कि प्रलय को असंभव न समझो। यह सब व्यवस्था इस बात का प्रमाण है कि तुम्हारा अस्तित्व व्यर्थ नहीं है कि मनमानी करो। (देखिए : तर्जुमानुल क़ुरआन, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद) इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि जब तुम्हारा अस्तित्व और रूप-रेखा कुछ भी तुम्हारे बस में नहीं, तो फिर जिस शक्ति ने सब किया उसी की शक्ति में प्रलय तथा प्रतिकार के होने को क्यों नहीं मानते?

İnfitar 82:9

हरगिज़ नहीं, बल्कि तुम बदले (के दिन) को झुठलाते हो।

İnfitar 82:10

हालाँकि निःसंदेह तुमपर निगेहबान नियुक्त हैं।

İnfitar 82:11

जो सम्माननीय लिखने वाले हैं।

İnfitar 82:12

वे जानते हैं, जो तुम करते हो।[3] ——— [3] (9-12) इन आयतों में इस भ्रम का खंडन किया गया है कि सभी कर्मों और कथनों का ज्ञान कैसे हो सकता है।

İnfitar 82:13

निःसंदेह नेक लोग बड़ी नेमत (आनंद) में होंगे।

İnfitar 82:14

और निःसंदेह दुराचारी लोग जहन्नम में होंगे।

İnfitar 82:15

वे उसमें बदले के दिन प्रवेश करेंगे।

İnfitar 82:16

और वे उससे कभी ग़ायब होने वाले नहीं हैं।[4] ——— [4] (13-16) इन आयतों में सदाचारियों तथा दुराचारियों का परिणाम बताया गया है कि एक स्वर्ग के सुखों में रहेगा और दूसरा नरक के दंड का भागी बनेगा।

İnfitar 82:17

और आप क्या जानें कि बदले का दिन क्या है?

İnfitar 82:18

फिर आप क्या जानें कि बदले का दिन क्या है?

İnfitar 82:19

जिस दिन कोई प्राणी किसी प्राणी के लिए किसी चीज़ का अधिकार न रखेगा और उस दिन आदेश केवल अल्लाह का होगा।[5] ——— [5] (17-19) इन आयतों में दो वाक्यों में प्रलय की चर्चा दोहराकर उसकी भयानकता को दर्शाते हुए बताया गया है कि निर्णय बे लाग होगा। कोई किसी की सहायता नहीं कर सकेगा। सत्य आस्था और सत्कर्म ही सहायक होंगे जिसका मार्ग क़ुरआन दिखा रहा है। क़ुरआन की सभी आयतों में प्रतिकार का दिन प्रलय के दिन को ही बताया गया है जिस दिन प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्मानुसार प्रतिकार मिलेगा।

Mütaffifin 83:1

विनाश है नाप-तौल में कमी करने वालों के लिए।

Mütaffifin 83:2

वे लोग कि जब लोगों से नापकर लेते हैं, तो पूरा लेते हैं।

Mütaffifin 83:3

और जब उन्हें नापकर या तौलकर देते हैं, तो कम देते हैं।

Mütaffifin 83:4

क्या वे लोग विश्वास नहीं रखते कि वे (मरने के बाद) उठाए जाने वाले हैं?

Mütaffifin 83:5

एक बहुत बड़े दिन के लिए।

Mütaffifin 83:6

जिस दिन लोग सर्व संसार के पालनहार के सामने खड़े होंगे।[1] ——— [1] (1-6) इस सूरत की प्रथम छह आयतों में इसी व्यवसायिक विश्वास घात पर पकड़ की गई है कि न्याय तो यह है कि अपने लिए अन्याय नहीं चाहते, तो दूसरों के साथ न्याय करो। और इस रोग का निवारण अल्लाह के भय तथा परलोक पर विश्वास ही से हो सकता है। क्योंकि इस स्थिति में अमानतदारी एक नीति ही नहीं, बल्कि धार्मिक कर्तव्य होगा औ इस पर स्थित रहना लाभ तथा हानि पर निर्भर नहीं रहेगा।

Mütaffifin 83:7

हरगिज़ नहीं, निःसंदेह दुराचारियों का कर्म-पत्र "सिज्जीन" में है।

Mütaffifin 83:8

और तुम क्या जानो कि 'सिज्जीन' क्या है?

Mütaffifin 83:9

वह एक लिखित पुस्तक है।

Mütaffifin 83:10

उस दिन झुठलाने वालों के लिए विनाश है।

Mütaffifin 83:11

जो बदले के दिन को झुठलाते हैं।

Mütaffifin 83:12

तथा उसे केवल वही झुठलाता है, जो सीमा का उल्लंघन करने वाला, बड़ा पापी है।

Mütaffifin 83:13

जब उसके सामने हमारी आयतों को पढ़ा जाता है, तो कहता है : यह पहले लोगों की कहानियाँ हैं।

Mütaffifin 83:14

हरगिज़ नहीं, बल्कि जो कुछ वे कमाते थे, वह ज़ंग बनकर उनके दिलों पर छा गया है।

Mütaffifin 83:15

हरगिज़ नहीं, निश्चय वे उस दिन अपने पालनहार (के दर्शन) से रोक दिए जाएँगे।

Mütaffifin 83:16

फिर निःसंदेह वे अवश्य जहन्नम में प्रवेश करने वाले हैं।

Mütaffifin 83:17

फिर कहा जाएगा : यही है, जिसे तुम झुठलाया करते थे।[2] ——— [2] (7-17) इन आयतों में कुकर्मियों के दुष्परिणाम का विवरण दिया गया है। तथा यह बताया गया है कि उनके कुकर्म पहले ही से अपराध पत्रों में अंकित किए जा रहे हैं। तथा वे परलोक में कड़ी यातना का सामना करेंगे। और नरक में झोंक दिए जाएँगे। "सिज्जीन" से अभिप्राय, एक जगह है जहाँ पर काफ़िरों, अत्याचारियों और मुश्रिकों के कुकर्म पत्र तथा प्राण एकत्र किए जाते हैं। दिलों का लोहमल, पापों की कालिमा को कहा गया है। पाप अंतरात्मा को अंधकार बना देते हैं, तो सत्य को स्वीकार करने की स्वभाविक योग्यता खो देते हैं।

Mütaffifin 83:18

हरगिज़ नहीं, निःसंदेह नेक लोगों का कर्म-पत्र निश्चय "इल्लिय्यीन" में है।

Mütaffifin 83:19

और तुम क्या जानो कि 'इल्लिय्यीन' क्या है?

Mütaffifin 83:20

वह एक लिखित पुस्तक है।

Mütaffifin 83:21

जिसके पास समीपवर्ती (फरिश्ते) उपस्थित रहते हैं।

Mütaffifin 83:22

निःसंदेह नेक लोग बड़ी नेमत (आनंद) में होंगे।

Mütaffifin 83:23

तख़्तों पर (बैठे) देख रहे होंगे।

Mütaffifin 83:24

तुम उनके चेहरों पर नेमत की ताज़गी का आभास करोगे।

Mütaffifin 83:25

उन्हें मुहर लगी शुद्ध शराब पिलाई जाएगी।

Mütaffifin 83:26

उसकी मुहर कस्तूरी की होगी। अतः प्रतिस्पर्धा करने वालों को इसी (की प्राप्ति) के लिए प्रतिस्पर्धा करना चाहिए।

Mütaffifin 83:27

उसमें 'तसनीम' की मिलावट होगी।

Mütaffifin 83:28

वह एक स्रोत है, जिससे समीपवर्ती लोग पिएँगे।[3] ——— [3] (18-28) इन आयतों में बताया गया है कि सदाचारियों के कर्म ऊँचे पत्रों में अंकित किए जा रहे हैं जो फ़रिश्तों के पास सुरक्षित हैं। और वे स्वर्ग में सुख के साथ रहेंगे। "इल्लिय्यीन" से अभिप्राय, जन्नत में एक जगह है। जहाँ पर नेक लोगों के कर्म पत्र तथा प्राण एकत्र किए जाते हैं। वहाँ पर समीपवर्ती फ़रिश्ते उपस्थित रहते हैं।

Mütaffifin 83:29

निःसंदेह जो लोग अपराधी हैं, वे (दुनिया में) ईमान लाने वालों पर हँसा करते थे।

Mütaffifin 83:30

और जब वे उनके पास से गुज़रते, तो आपस में आँखों से इशारे किया करते थे।

Mütaffifin 83:31

और जब अपने घर वालों की ओर लौटते, तो (मोमिनों के परिहास का) आनंद लेते हुए लौटते थे।

Mütaffifin 83:32

और जब वे उन (मोमिनों) को देखते, तो कहते थे : निःसंदेह ये लोग निश्चय भटके हुए हैं।

Mütaffifin 83:33

हालाँकि वे उनपर निरीक्षक बनाकर नहीं भेजे गए थे।

Mütaffifin 83:34

तो आज वे लोग जो ईमान लाए, काफ़िरों पर हँस रहे हैं।

Mütaffifin 83:35

तख़्तों पर बैठे देख रहे हैं।

Mütaffifin 83:36

क्या काफ़िरों को उसका बदला मिल गया, जो वे किया करते थे?[4] ——— [4] (29-36) इन आयतों में बताया गया है कि परलोक में कर्मों का फल दिया जाएगा, तो सांसारिक परिस्थितियाँ बदल जाएँगी। संसार में तो सब के लिए अल्लाह की दया है, परंतु न्याय के दिन जो अपने सुख सुविधा पर गर्व करते थे और जिन निर्धन मुसलमानों को देखकर आँखें मारते थे, वहाँ पर वही उनके दुष्परिणाम को देख कर प्रसन्न होंगे। अंतिम आयत में विश्वासहीनों के दुष्परिणाम को उनका कर्म कहा गया है। जिसमें यह संकेत है कि अच्छा फल और कुफल स्वयं इमसान के अपने कर्मों का स्वभाविक प्रभाव होगा।

İnşikak 84:1

जब आकाश फट जाएगा।

İnşikak 84:2

और अपने पालनहार के आदेश पर कान लगाएगा और यही उसके योग्य है।

İnşikak 84:3

तथा जब धरती फैला दी जाएगी।

İnşikak 84:4

और जो कुछ उसके भीतर है, उसे निकाल बाहर फेंक देगी और खाली हो जाएगी।

İnşikak 84:5

और अपने पालनहार के आदेश पर कान लगाएगी और यही उसके योग्य है।[1] ——— [1] (1-5) इन आयतों में प्रलय के समय आकाश एवं धरती में जो हलचल होगी उसका चित्रण करते हुए यह बताया गया है कि इस ब्रह्मांड के विधाता के आज्ञानुसार ये आकाश और धरती कार्यरत हैं और प्रलय के समय भी उसी की आज्ञा का पालन करेंगे। धरती को फैलाने का अर्थ यह है कि पर्वत आदि खंड-खंड होकर समस्त भूमि चौरस कर दी जाएगी।

İnşikak 84:6

ऐ इनसान! निःसंदेह तू कठिन परिश्रम करते-करते अपने पालनहार की ओर जाने वाला है, फिर तू उससे मिलने वाला है।

İnşikak 84:7

फिर जिस व्यक्ति को उसका कर्मपत्र उसके दाहिने हाथ में दिया गया।

İnşikak 84:8

तो उसका आसान हिसाब लिया जाएगा।

İnşikak 84:9

तथा वह अपने लोगों की ओर ख़ुश-ख़ुश लौटेगा।

İnşikak 84:10

और लेकिन जिसे उसका कर्मपत्र उसकी पीठ के पीछे दिया गया।

İnşikak 84:11

तो वह विनाश को पुकारेगा।

İnşikak 84:12

तथा जहन्नम में प्रवेश करेगा।

İnşikak 84:13

निःसंदेह वह अपने घर वालों में बड़ा प्रसन्न था।

İnşikak 84:14

निश्चय उसने समझा था कि वह कभी (अल्लाह की ओर) वापस नहीं लौटेगा।

İnşikak 84:15

क्यों नहीं, निश्चय उसका पालनहार उसे देख रहा था।[2] ——— [2] (6-15) इन आयतों में इनसान को सावधान किया गया है कि तुझे भी अपने पालनहार से मिलना है। और धीरे-धीरे उसी की ओर जा रहा है। वहाँ अपने कर्मानुसार जिसे दाएँ हाथ में कर्म-पत्र मिलेगा, वह अपनों से प्रसन्न होकर मिलेगा। और जिसको बाएँ हाथ में कर्म-पत्र दिया जाएगा, तो वह विनाश को पुकारेगा। यह वही होगा जिसने माया मोह में क़ुरआन को नकार दिया था। और सोचा कि इस सांसारिक जीवन के पश्चात कोई जीवन नहीं आएगा।

İnşikak 84:16

मैं क़सम खाता हूँ शफ़क़ (सूर्यास्त के बाद की लाली) की।

İnşikak 84:17

तथा रात की और उसकी जो कुछ वह एकत्रित करती है!

İnşikak 84:18

तथा चाँद की, जब वह पूरा हो जाता है।

İnşikak 84:19

तुम अवश्य एक अवस्था से दूसरी अवस्था में स्थानांतरित होते रहोगे।

İnşikak 84:20

फिर उन्हें क्या हो गया है कि वे ईमान नहीं लाते?

İnşikak 84:21

और जब उनके सामने क़ुरआन पढ़ा जाता है, तो सजदा नहीं करते।[3] ——— [3] (16-21) इन आयतों में ब्रह्मांड के कुछ लक्षणों को साक्ष्य स्वरूप प्रस्तुत करके सावधान किया गया है कि जिस प्रकार यह ब्रह्मांड तीन स्थितियों से गुज़रता है, उसी प्रकार तुम्हें भी तीन स्थितियों से गुज़रना है : सांसारिक जीवन, फिर मरण, फिर परलोक का स्थायी जीवन जिसका सुख-दुख सांसारिक कर्मों के आधार पर होगा।

İnşikak 84:22

बल्कि जिन्होंने कुफ़्र किया, वे (उसे) झुठलाते हैं।

İnşikak 84:23

और अल्लाह सबसे अधिक जानने वाला है जो कुछ वे अपने भीतर रखते हैं।

İnşikak 84:24

अतः उन्हें एक दर्दनाक यातना की शुभ सूचना दे दो।

İnşikak 84:25

परंतु जो लोग ईमान लाए तथा उन्होंने सत्कर्म किए, उनके लिए कभी न समाप्त होने वाला बदला है।[4] ——— [4] (22-25) इन आयतों में उनके लिए चेतावनी है, जो इन स्वभाविक साक्ष्यों के होते हुए क़ुरआन को न मानने पर अड़े हुए हैं। और उनके लिए शुभ सूचना है जो इसे मानकर विश्वास (ईमान) तथा सुकर्म की राह पर अग्रसर हैं।

Büruc 85:1

क़सम है बुर्जों वाले आकाश की!

Büruc 85:2

और क़सम है उस दिन की, जिसका वादा किया गया है!

Büruc 85:3

क़सम है गवाह की और उसकी, जिसके बारे में गवाही दी जाएगी!

Büruc 85:4

खाई वालों का नाश हो गया![1] ——— [1] (1-4) इनमें तीन चीज़ों की शपथ ली गई है। (1) बुर्जों वाले आकाश की। (2) प्रलय की, जिसका वचन दिया गया है। (3) प्रलय के भयावह दृश्य की और उस पूरी सृष्टि की जो उसे देखेगी। प्रथम शपथ इस बात की गवाही दे रही है कि जो शक्ति इस आकाश के ग्रहों पर राज कर रही है उसकी पकड़ से यह तुच्छ इनसान बच कर कहाँ जा सकता है? दूसरी शपथ इस बात पर है कि संसार में इनसान जो अत्याचार करना चाहे कर ले, परंतु वह दिन अवश्य आना है जिससे उसे सावधान किया जा रहा है, जिसमें सबके साथ न्याय किया जाएगा, और अत्याचारियों की पकड़ की जाएगी। तीसरी शपथ इस पर है कि जैसे इन अत्याचारियों ने विवश आस्तिकों के जलने का दृश्य देखा, इसी प्रकार प्रलय के दिन पूरी मानवजाति देखेगी कि उनकी क्या दुर्गत है।

Büruc 85:5

जिसमें ईंधन से भरी आग थी।

Büruc 85:6

जबकि वे उस (के किनारों) पर बैठे हुए थे।

Büruc 85:7

और वे ईमान वालों के साथ जो कुछ कर रहे थे, उस पर गवाह थे।

Büruc 85:8

और उन्हें ईमान वालों की केवल यह बात बुरी लगी कि वे उस अल्लाह पर ईमान रखते थे, जो प्रभुत्वशाली और हर प्रकार की प्रशंसा के योग्य है।

Büruc 85:9

वह (अल्लाह) कि जिसके लिए आकाशों और धरती का राज्य है, और अल्लाह हर चीज़ से अवगत है।

Büruc 85:10

निश्चय जिन लोगों ने ईमान वाले पुरुषों और ईमान वाली स्त्रियों को परीक्षण में डाला (सताया), फिर तौबा न की, तो उनके लिए जहन्नम की यातना है तथा उनके लिए जलाने वाली यातना है।

Büruc 85:11

निःसंदेह जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे काम किए, उनके लिए ऐसे बाग़ हैं, जिनके नीचे नहरें बह रही हैं और यही बहुत बड़ी सफलता है।[2] ——— [2] (5-11) इन आयतों में जो आस्तिक सताए गए, उनके लिए सहायता का वादा तथा यदि वे अपने विश्वास (ईमान) पर स्थित रहे, तो उनके लिए स्वर्ग की शुभ सूचना और अत्याचारियों के लिए नरक की धमकी है जिन्होंने उनको सताया और फिर अल्लाह से क्षमा याचना आदि करके सत्य को नहीं माना।

Büruc 85:12

निःसंदेह तेरे पालनहार की पकड़ बड़ी सख्त है।

Büruc 85:13

निःसंदेह वही पहली बार पैदा करता है और (वही) दूसरी बार पैदा करेगा।

Büruc 85:14

और वह है जो अत्यंत क्षमा करने वाला, बहुत प्रेम करने वाला है।

Büruc 85:15

वह अर्श (सिंहासन) का मालिक, बड़ा गौरवशाली है।

Büruc 85:16

वह जो चाहता है, कर गुज़रने वाला है।[3] ——— [3] (12-16) इन आयतों में बताया गया है कि अल्लाह की पकड़ के साथ ही जो क्षमा याचना करके उसपर ईमान लाए, उसके लिए क्षमा और दया का द्वार खुला हुआ है। क़ुरआन ने इस कुविचार का खंडन किया है कि अल्लाह, पापों को क्षमा नहीं कर सकता। क्योंकि इससे संसार पापों से भर जाएगा और कोई स्वार्थी पाप करके क्षमा याचना कर लेगा, फिर पाप करेगा। यह कुविचार उस समय सह़ीह़ हो सकता है जब अल्लाह को एक इनसान मान लिया जाए, जो यह न जानता हो कि जो व्यक्ति क्षमा माँग रहा है उसके मन में क्या है? अल्लाह तो मर्मज्ञ है, वह जानता है कि किसके मन में क्या है? फिर "तौबा" इसका नाम नहीं कि मुख से इस शब्द को बोल दिया जाए। तौबा (पश्चाताप) मन से पाप न करने के संकल्प का नाम है और अल्लाह तआला जानता है कि किसके मन में क्या है?

Büruc 85:17

(ऐ नबी!) क्या तुम्हें सेनाओं की ख़बर पहुँची है?

Büruc 85:18

फ़िरऔन तथा समूद की?[4] ——— [4] (17-18) इनमें अतीत की कुछ अत्याचारी जातियों की ओर संकेत है, जिनका सविस्तार वर्णन क़ुरआन की अनेक सूरतों में आया है। जिन्होंने आस्तिकों पर अत्याचार किए, जैसे मक्का के क़ुरैश मुसलमानों पर कर रहे थे। जबकि उनको पता था कि पिछली जातियों के साथ क्या हुआ। परंतु वे अपने परिणाम से ग़ाफ़िल थे।

Büruc 85:19

बल्कि वे लोग जिन्होंने कुफ़्र किया, झुठलाने में लगे हुए हैं।

Büruc 85:20

और अल्लाह उनके पीछे से (उन्हें) घेरे हुए है।[5] ——— [5] (19-20) इन दो आयतों में उनके दुर्भाग्य को बताया जा रहा है जो अपने प्रभुत्व के गर्व में क़ुरआन को नहीं मानते। जबकि उसे माने बिना कोई उपाय नहीं, और वे अल्लाह के अधिकार के भीतर ही हैं।

Büruc 85:21

बल्कि वह गौरव वाला क़ुरआन है।

Büruc 85:22

जो लौह़े मह़फ़ूज़ (सुरक्षित पट्टिका) में लिखा हुआ है।[6] ——— [6] (21-22) इन आयतों में बताया गया है कि यह क़ुरआन कविता और ज्योतिष नहीं है, जैसा कि वे सोचते हैं, यह अल्लाह का श्रेष्ठ और उच्चतम कथन है, जिसका उद्गम "लौह़े मह़फ़ूज़" में सुरक्षित है।

Târık 86:1

क़सम है आकाश की तथा रात में प्रकट होने वाले की!

Târık 86:2

और तुम क्या जानो कि रात में प्रकट होने वाला क्या है?

Târık 86:3

वह चमकता हुआ सितारा है।

Târık 86:4

प्रत्येक प्राणी पर एक निरीक्षक नियुक्त है।[1] ——— [1] (1-4) इनमें आकाश के तारों को इस बात की गवाही में लाया गया है कि ब्रह्मांड की कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो एक रक्षक के बिना अपने स्थान पर स्थित रह सकती है, और वह रक्षक स्वयं अल्लाह है।

Târık 86:5

अतः इनसान को देखना चाहिए कि वह किस चीज़ से पैदा किया गया है?

Târık 86:6

वह एक उछलने वाले पानी से पैदा किया गया है।

Târık 86:7

जो पीठ और सीने की हड्डियों के बीच से निकलता है।

Târık 86:8

निःसंदेह वह उसे लौटाने में निश्चय सक्षम है।[2] ——— [2] (5-8) इन आयतों में इनसान का ध्यान उसके अस्तित्व की ओर आकर्षित किया गया है कि वह विचार तो करे कि कैसे पैदा किया गया है वीर्य से? फिर उसकी निरंतर रक्षा कर रहा है। फिर वही उसे मृत्यु के पश्चात पुनः पैदा करने की शक्ति भी रखता है।

Târık 86:9

जिस दिन छिपी हुई बातों की जाँच-पड़ताल की जाएगी।

Târık 86:10

तो (उस दिन) उसके पास न कोई शक्ति होगी और न ही कोई सहायक।[3] ——— [3] (9-10) इन आयतों में यह बताया गया है कि फिर से पैदाइश इसलिए होगी ताकि इनसान के सभी भेदों की जाँच की जाए, जिनपर संसार में पर्दा पड़ा रह गया था और सबका बदला न्याय के साथ दिया जाए।

Târık 86:11

क़सम है बार-बार बारिश बरसाने वाले आसमान की।

Târık 86:12

तथा फटने वाली धरती की।

Târık 86:13

निश्चय ही यह (क़ुरआन) एक निर्णायक कथन है।

Târık 86:14

और यह हँसी-मज़ाक़ नही है।[4] ——— [4] (11-14) इन आयतों में बताया गया है कि आकाश से वर्षा का होना तथा धरती से पेड़ पौधों का उपजना कोई खेल नहीं, एक गंभीर कर्म है। इसी प्रकार क़ुरआन में जो तथ्य बताए गए हैं, वे भी हँसी-उपहास नहीं हैं, पक्की और अडिग बातें हैं। काफ़िर (विश्वासहीन) इस भ्रम में न रहें कि उनकी चालें इस क़ुरआन के आमंत्रण को विफल कर देंगी। अल्लाह भी एक उपाय में लगा है जिसके आगे इनकी चालें धरी रह जाएँगी।

Târık 86:15

निःसंदेह वे गुप्त उपाय करते हैं।

Târık 86:16

और मैं भी गुप्त उपाय करता हूँ।

Târık 86:17

अतः काफ़िरों को मोहलत दे दें, उन्हें थोड़ी देर के लिए छोड़ दें।[5] ——— [5] (15-17) इन आयतों में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को सांत्वना तथा अधर्मियों को यह धमकी देकर बात पूरी कर दी गई है कि आप तनिक सहन करें और विश्वासहीन को मनमानी कर लेने दें, कुछ ही देर होगी कि इन्हें अपने दुष्परिणाम का ज्ञान हो जाएगा। और इक्कीस वर्ष ही बीते थे कि पूरे मक्का और अरब द्वीप में इस्लाम का ध्वज लहराने लगा।

A'lâ 87:1

अपने सर्वोच्च पालनहार के नाम की पवित्रता का वर्णन करो।

A'lâ 87:2

जिसने पैदा किया और ठीक-ठीक बनाया।

A'lâ 87:3

और जिसने (हर चीज़ को) अनुमानित किया, फिर मार्ग दिखाया।

A'lâ 87:4

और जिसने चारा उगाया।[1] ——— [1] (1-4) इन आयतों में जिस पालनहार ने अपने नाम की पवित्रता का वर्णन करने का आदेश दिया है उसका परिचय दिया गया है कि वह पालनहार है जिसने सभी को पैदा किया, फिर उनको संतुलित किया, और उनके लिए एक विशेष प्रकार का अनुमान बनाया जिसकी सीमा से नहीं निकल सकते, और उनके लिए उस कार्य को पूरा करने की राह दिखाई जिसके लिए उन्हें पैदा किया है।

A'lâ 87:5

फिर उसे (सुखाकर) काले रंग का कूड़ा बना दिया।[2] ——— [2] (4-5) इन आयतों में बताया गया है कि प्रत्येक कार्य अनुक्रम से धीरे-धीरे होते हैं। धरती के पौधे धीरे-धीरे गुंजान और हरे-भरे होते हैं। ऐसे ही मानवीय योग्यताएँ भी धीरे-धीरे पूरी होती हैं।

A'lâ 87:6

(ऐ नबी!) हम तुम्हें ऐसा पढ़ाएँगे कि तुम नहीं भूलोगे।

A'lâ 87:7

परन्तु जो अल्लाह चाहे। निश्चय ही वह खुली बात को जानता है और उस बात को भी जो छिपी हुई है।

A'lâ 87:8

और हम तुम्हारे लिए सरल मार्ग आसान कर देंगे।[3] ——— [3] (6-8) इनमें नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह निर्देश दिया गया है कि इसकी चिंता न करें कि क़ुरआन मुझे कैसे याद होगा, इसे याद कराना हमारा काम है, और इसका सुरक्षित रहना हमारी दया से होगा। और यह उसकी दया और रक्षा है कि इस मानव संसार में किसी धार्मिक ग्रंथ के संबंध में यह दावा नहीं किया जा सकता कि वह सुरक्षित है, यह गौरव केवल क़ुरआन ही को प्राप्त है।

A'lâ 87:9

तो आप नसीहत करते रहें। अगर नसीहत करना लाभदायक हो।

A'lâ 87:10

वह व्यक्ति उपदेश ग्रहण करेगा, जो डरता है।

A'lâ 87:11

और उससे दूर रहेगा, जो सबसे बड़ा अभागा है।

A'lâ 87:12

जो सबसे बड़ी आग में प्रवेश करेगा।

A'lâ 87:13

फिर वह उसमें न मरेगा, न जिएगा।[4] ——— [4] (9-13) इनमें बताया गया है कि आपको मात्र इसका प्रचार-प्रसार करना है। और इसकी सरल राह यह है कि जो सुने और मानने के लिए तैयार हो, उसे शिक्षा दी जाए। किसी के पीछे पड़ने की आवश्यकता नहीं है। जो हत्भागे हैं, वही नहीं सुनेंगे और नरक की यातना के रूप में अपना दुष्परिणाम देखेंगे।

A'lâ 87:14

निश्चय वह सफल हो गया, जो पाक हो गया।

A'lâ 87:15

तथा अपने पालनहार के नाम को याद किया और नमाज़ पढ़ी।[5] ——— [5] (14-15) इन आयतों में कहा गया है कि सफलता मात्र उनके लिए है, जो आस्था, स्वभाव तथा कर्म की पवित्रता को अपनाएँ, और नमाज़ अदा करते रहें।

A'lâ 87:16

बल्कि तुम सांसारिक जीवन को प्राथमिकता देते हो।

A'lâ 87:17

हालाँकि आख़िरत बहुत उत्तम और अधिक बाक़ी रहने वाली है।

A'lâ 87:18

निःसंदेह यह बात पहले सह़ीफ़ों (ग्रंथों) में है।

A'lâ 87:19

इबराहीम तथा मूसा के सह़ीफ़ों (ग्रंथों) में।[6] ——— [6] (16-19) इन आयतों का भावार्थ यह है कि वास्तव में रोग यह है कि काफ़िरों को सांसारिक स्वार्थ के कारण नबी की बातें अच्छी नहीं लगतीं। जबकि परलोक ही स्थायी है। और यही सभी आदि ग्रंथों की शिक्षा है।

Gâşiye 88:1

क्या तेरे पास ढाँपने लेने वाली (क़ियामत) की ख़बर पहुँची?

Gâşiye 88:2

उस दिन कई चेहरे अपमानित होंगे।

Gâşiye 88:3

कठिन परिश्रम करने वाले, थक जाने वाले।

Gâşiye 88:4

वे गर्म धधकती आग में प्रवेश करेंगे।

Gâşiye 88:5

उन्हें खौलते सोते का जल पिलाया जाएगा।

Gâşiye 88:6

उनके लिए कांटेदार झाड़ के सिवा कोई खाना नहीं होगा।

Gâşiye 88:7

जो न मोटा करेगा और न भूख मिटाएगा।[1] ——— [1] (1-7) इन आयतों में सबसे पहले सांसारिक स्वार्थ में मग्न इनसानों को एक प्रश्न द्वारा सावधान किया गया है कि उसे उस समय की सूचना है जब एक आपदा समस्त संसार पर छा जाएगी? फिर इसी के साथ यह विवरण भी दिया गया है कि उस समय इनसानों के दो भेद हो जाएँगे, और दोनों के प्रतिफल भी भिन्न होंगे : एक नरक में तथा दूसरा स्वर्ग में जाएगा। तीसरी आयत में "नासिबह" का शब्द आया है जिसका अर्थ है, थक कर चूर हो जाना, अर्थात काफ़िरों को क़ियामत के दिन इतनी कड़ी यातना दी जाएगी कि उनकी दशा बहुत ख़राब हो जाएगी। और वे थके-थके से दिखाई देंगे। इसका दूसरा अर्थ यह भी है कि उन्होंने संसार में बहुत-से कर्म किए होंगे, परंतु वे सत्य धर्म के अनुसार नहीं होंगे, इसलिए वे उपासना और कड़ी तपस्या करके भी नरक में जाएँगे। क्योंकि सत्य आस्था के बिना कोई कर्म मान्य नहीं होगा।

Gâşiye 88:8

उस दिन कई चेहरे प्रफुल्लित होंगे।

Gâşiye 88:9

अपने प्रयास पर प्रसन्न होंगे।

Gâşiye 88:10

ऊँची जन्नत में होंगे।

Gâşiye 88:11

उसमें कोई बेकार (अशिष्ट) बात नहीं सुनेंगे।

Gâşiye 88:12

उसमें बहने वाले स्रोत (चश्मे) हैं।

Gâşiye 88:13

उसमें ऊँचे-ऊँचे तख्त हैं।

Gâşiye 88:14

और (पीने वालों के लिए तैयार) रखे हुए प्याले हैं।

Gâşiye 88:15

और क्रम में लगे हुए गाव-तकिए हैं।

Gâşiye 88:16

और बिछाए हुए क़ालीन हैं।[2] ——— [2] (8-16) इन आयतों में जो इस संसार में सत्य आस्था के साथ क़ुरआन आदेशानुसार जीवन व्यतीत कर रहे हैं परलोक में उनके सदा के सुख का दृश्य दिखाया गया है।

Gâşiye 88:17

क्या वे ऊँटों को नहीं देखते कि वे कैसे पैदा किए गए हैं?

Gâşiye 88:18

और आकाश को (नहीं देखते) कि उसे कैसे ऊँचा किया गया?

Gâşiye 88:19

और पर्वतों को (नहीं देखते) कि कैसे गाड़े गए हैं?

Gâşiye 88:20

तथा धरती को (नहीं देखते) कि कैसे बिछाई गई है?[3] ——— [3] (17-20) इन आयतों में फिर विषय बदल कर एक प्रश्न किया जा रहा है कि जो क़ुरआन की शिक्षा तथा परलोक की सूचना को नहीं मानते, अपने सामने उन चीज़ों को नहीं देखते जो रात दिन उनके सामने आती रहती हैं, ऊँटों तथा पर्वतों और आकाश एवं धरती पर विचार क्यों नहीं करते कि क्या ये सब अपने आप पैदा हो गए हैं या इनका कोई रचयिता है? यह तो असंभव है कि रचना हो और रचयिता न हो। यदि मानते हैं कि किसी शक्ति ने इनको बनाया है जिसका कोई साझी नहीं तो उसके अकेले पूज्य होने और उसके फिर से पैदा करने की शक्ति और सामर्थ्य का क्यों इनकार करते हैं? (तर्जुमानुल क़ुरआन)

Gâşiye 88:21

अतः आप नसीहत करें, आप केवल नसीहत करने वाले हैं।

Gâşiye 88:22

आप उनपर कोई दरोग़ा (नियंत्रक) नहीं हैं।

Gâşiye 88:23

परंतु जिसने मुँह फेरा और कुफ़्र किया।

Gâşiye 88:24

तो अल्लाह उसे सबसे बड़ी यातना देगा।

Gâşiye 88:25

निःसंदेह हमारी ही ओर उनका लौटकर आना है।

Gâşiye 88:26

फिर बेशक हमारे ही ज़िम्मे उनका ह़िसाब लेना है।[4] ——— [4] (21-26) इन आयतों का भावार्थ यह है कि क़ुरआन किसी को बलपूर्वक मनवाने के लिए नहीं है, और न नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह कर्तव्य है कि किसी को बलपूर्वक मनवाएँ। आप जिससे डरा रहे हैं, ये मानें या न मानें, वह खुली बात है। फिर भी जो नहीं सुनते उनको अल्लाह ही समझेगा। ये और इस जैसी क़ुरआन की अनेक आयतें इस आरोप का खंडन करती हैं कि इस्लाम ने अपने मनवाने के लिए अस्त्र शस्त्र का प्रयोग किया है।

Fecr 89:1

क़सम है फ़ज्र (उषाकाल) की!

Fecr 89:2

तथा दस रातों की!

Fecr 89:3

और सम (जोड़े) और विषम (अकेले) की!

Fecr 89:4

और रात की, जब वह चलती है!

Fecr 89:5

निश्चय इसमें बुद्धिमान के लिए बड़ी क़सम है?[1] ——— [1] (1-5) इन आयतों में सबसे पहले चार चीजों की क़सम खाई गई है, जिन्हें परलोक में कर्मों के फल के सबूत के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जिस का अर्थ यह है कि कर्मों का फल सत्य है। जिस व्यवस्था से यह दिन-रात चल रहा है उससे सिद्ध होता है कि अल्लाह ही इसे चला रहा है। "दस रात्रियों" से अभिप्राय "ज़ुल ह़िज्जा" मास की प्रारंभिक दस रातें हैं। सह़ीह़ ह़दीसों में इनकी बड़ी प्रधानता बताई गई है।

Fecr 89:6

क्या तुमने नहीं देखा कि तुम्हारे पालनहार ने "आद" के साथ किस तरह किया?

Fecr 89:7

(वे आद) जो स्तंभों वाले 'इरम' (गोत्र के लोग) थे।

Fecr 89:8

जिनके समान (दुनिया के) शहरों में कोई पैदा नहीं किया गया।

Fecr 89:9

तथा 'समूद' के साथ (किस तरह किया) जिन्होंने वादी में चट्टानों को तराशा।

Fecr 89:10

और मेखों वाले फ़िरऔन के साथ (किस तरह किया)।

Fecr 89:11

वे लोग, जो नगरों में हद से बढ़ गए।

Fecr 89:12

और उनमें बहुत अधिक उपद्रव फैलाया।

Fecr 89:13

तो तेरे पालनहार ने उनपर यातना का कोड़ा बरसाया।

Fecr 89:14

निःसंदेह तेरा पालनहार निश्चय घात में है।[2] ——— [2] (6-14) इन आयतों में उन जातियों की चर्चा की गई है, जिन्होंने माया मोह में पड़कर परलोक और प्रतिफल का इनकार किया, और अपने नैतिक पतन के कारण धरती में उग्रवाद किया। "आद, इरम" से अभिप्रेत वह पुरानी जाति है जिसे क़ुरआन तथा अरब में "आदे ऊला" (प्रथम आद) कहा गया है। यह वह प्राचीन जाति है जिसके पास हूद (अलैहिस्सलाम) को भेजा गया। और इनको "आदे इरम" इस लिए कहा गया है कि यह शामी वंशक्रम की उस शाखा से संबंधित थे जो इरम बिन शाम बिन नूह़ से चली आती थी। आयत संख्या 11 में इसका संकेत है कि उग्रवाद का उद्गम भौतिकवाद एवं सत्य विश्वास का इनकार है, जिसे वर्तमान युग में भी प्रत्यक्ष रूप में देखा जा सकता है।

Fecr 89:15

लेकिन मनुष्य (का हाल यह है कि) जब उसका पालनहार उसका परीक्षण करे, फिर उसे सम्मानित करे और नेमत प्रदान करे, तो कहता है कि मेरे पालनहार ने मुझे सम्मानित किया।

Fecr 89:16

लेकिन जब वह उसका परीक्षण करे, फिर उसपर उसकी रोज़ी तंग कर दे, तो कहता कि मेरे पालनहार ने मुझे अपमानित किया।

Fecr 89:17

हरगिज़ ऐसा नहीं, बल्कि तुम अनाथ का सम्मान नहीं करते।

Fecr 89:18

तथा तुम एक-दूसरे को ग़रीब को खाना खिलाने के लिए प्रोत्साहित नहीं करते हो।

Fecr 89:19

और तुम मीरास का सारा धन समेटकर खा जाते हो।

Fecr 89:20

और तुम धन से बहुत अधिक प्रेम करते हो।[3] ——— [3] (15-20) इन आयतों में समाज की साधारण नैतिक स्थिति का सर्वेक्षण किया गया है, और भौतिकवादी विचार की आलोचना की गई है, जो मात्र सांसारिक धन और मान मर्यादा को सम्मान तथा अपमान का पैमाना समझता है और यह भूल गया है कि न धनी होना कोई पुरस्कार है और न निर्धन होना कोई दंड है। अल्लाह दोनों स्थितियों में मानवजाति की परीक्षा ले रहा है। फिर यह बात किसी के बस में हो तो दूसरे का धन भी हड़प कर जाए, क्या ऐसा करना कुकर्म नहीं जिसका ह़िसाब लिया जाना चाहिए?

Fecr 89:21

हरगिज़ नहीं! जब धरती कूट-कूटकर चूर्ण-विचूर्ण कर दी जाएगी।

Fecr 89:22

और तेरा पालनहार आएगा और फ़रिश्ते जो पंक्तियों में होंगे।

Fecr 89:23

और उस दिन नरक लाई जाएगी। उस दिन इनसान याद करेगा। लेकिन उस दिन याद करना उसे कहाँ से लाभ देगा।

Fecr 89:24

वह कहेगा : ऐ काश! मैंने अपने (इस) जीवन के लिए कुछ आगे भेजा होता।

Fecr 89:25

चुनाँचे उस दिन उस (अल्लाह) के दंड जैसा दंड कोई नहीं देगा।

Fecr 89:26

और न उसके बाँधने जैसा कोई बाँधेगा।[4] ——— [4] (21-26) इन आयतों मे बताया गया है कि धन पूजने और उससे परलोक न बनाने का दुष्परिणाम नरक की घोर यातना के रूप में सामने आएगा, तब भौतिकवादी कुकर्मियों की समझ में आएगा कि क़ुरआन को न मानकर बड़ी भूल हुई और हाथ मलेंगे।

Fecr 89:27

ऐ संतुष्ट आत्मा!

Fecr 89:28

अपने पालनहार की ओर लौट चल, इस हाल में कि तू उससे प्रसन्न है, उसके निकट पसंदीदा है।

Fecr 89:29

अतः तू मेरे बंदों में प्रवेश कर जा।

Fecr 89:30

और मेरी जन्नत में प्रवेश कर जा।[5] ——— [5] (27-30) इन आयतों में उनके सुख और सफलता का वर्णन किया गया है, जो क़ुरआन की शिक्षा का अनुपालन करते हुए आत्मा की शांति के साथ जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

Beled 90:1

मैं इस नगर (मक्का) की क़सम खाता हूँ!

Beled 90:2

तथा तुम्हारे लिए इस नगर में लड़ाई हलाल होने वाली है।

Beled 90:3

तथा क़सम है पिता तथा उसकी संतान की!

Beled 90:4

निःसंदेह हमने मनुष्य को बड़ी कठिनाई में पैदा किया है।

Beled 90:5

क्या वह समझता है कि उसपर कभी किसी का वश नहीं चलेगा?[1] ——— [1] (1-5) इन आयतों में सर्व प्रथम मक्का नगर में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर जो घटनाएँ घट रही थीं, और आप तथा आपके अनुयायियों को सताया जा रहा था, उसको साक्षी के रूप में प्रस्तुत किया गया है कि इनसान की पैदाइश (रचना) संसार का स्वाद लेने के लिए नहीं हुई है। संसार परिश्रम तथा पीड़ाएँ झेलने का स्थान है। कोई इनसान इस स्थिति से गुज़रे बिना नहीं रह सकता। "पिता" से अभिप्राय आदम अलैहिस्सलमा और "संतान" से अभिप्राय समस्त मानवजाति (इनसान) हैं। फिर इनसान के इस भ्रम को दूर किया है कि उसके ऊपर कोई शक्ति नहीं है, जो उसके कर्मों को देख रही है, और समय आने पर उसकी पकड़ करेगी।

Beled 90:6

वह कहता है कि मैंने ढेर सारा धन ख़र्च कर दिया।

Beled 90:7

क्या वह समझता है कि उसे किसी ने नहीं देखा?[2] ——— [2] (1-5) इनमें यह बताया गया है कि संसार में बड़ाई तथा प्रधानता के ग़लत पैमाने बना लिए गए हैं, और जो दिखावे के लिए धन व्यय (ख़र्च) करता है उसकी प्रशंसा की जाती है, जबकि उसके ऊपर एक शक्ति है जो यह देख रही है कि उसने किन राहों में और किस लिए धन ख़र्च किया है।

Beled 90:8

क्या हमने उसके लिए दो आँखें नहीं बनाईं?

Beled 90:9

तथा एक ज़बान और दो होंठ (नहीं बनाए)?

Beled 90:10

और हमने उसे दोनों मार्ग दिखा दिए?!

Beled 90:11

परंतु उसने दुर्लभ घाटी में प्रवेश ही नहीं किया।

Beled 90:12

और तुम्हें किस चीज़ ने ज्ञात कराया कि वह दुर्लभ 'घाटी' क्या है?

Beled 90:13

(वह) गर्दन छुड़ाना है।

Beled 90:14

या किसी भूख वाले दिन में खाना खिलाना है।

Beled 90:15

किसी रिश्तेदार अनाथ को।

Beled 90:16

या मिट्टी में लथड़े हुए निर्धन को।[3] ——— [3] (8-16) इन आयतों में फरमाया गया है कि इनसान को ज्ञान और चिंतन के साधन और योग्यताएँ देकर हमने उसके सामने भलाई तथा बुराई के दोनों मार्ग खोल दिए हैं, एक नैतिक पतन की ओर ले जाता है और उसमें मन को अति स्वाद मिलता है। दूसरा नैतिक ऊँचाईयों की राह जिस में कठिनाईयाँ हैं। और उसी को घाटी कहा गया है। जिसमें प्रवेश करने वालों के कर्तव्य में है कि दासों को मुक्त करें, निर्धनों को भोजन कराएँ इत्यादि, वही लोग स्वर्गवासी हैं। और वे जिन्होंने अल्लाह की आयतों का इनकार किया, वे नरकवासी हैं। आयत संख्या 17 का अर्थ यह है कि सत्य विश्वास (ईमान) के बिना कोई सत्कर्म मान्य नहीं है। इसमें सुखी समाज की विशेषता भी बताई गई है कि दूसरे को सहनशीलता तथा दया का उपदेश दिया जाए और अल्लाह पर सत्य विश्वास रखा जाए।

Beled 90:17

फिर वह उन लोगों में से हो, जो ईमान लाए और एक-दूसरे को धैर्य रखने की सलाह दी और एक-दूसरे को दया करने की सलाह दी।

Beled 90:18

यही लोग दाहिने हाथ वाले (सौभाग्यशाली) हैं।

Beled 90:19

और जिन लोगों ने हमारी आयतों का इनकार किया, वही लोग बाएँ हाथ वाले (दुर्भाग्यशाली) हैं।

Beled 90:20

उनपर (हर ओर से) बंद की हुई आग होगी।

Şems 91:1

सूरज की क़सम! तथा उसके ऊपर चढ़ने के समय की क़सम!

Şems 91:2

तथा चाँद की (क़सम), जब वह सूरज के पीछे आए।

Şems 91:3

और दिन की (क़सम), जब वह उस (सूरज) को प्रकट कर दे!

Şems 91:4

और रात की (क़सम), जब वह उस (सूरज) को ढाँप ले।

Şems 91:5

और आकाश की तथा उसके निर्माण की (क़सम)।

Şems 91:6

और धरती की तथा उसे बिछाने की (क़सम!)[1] ——— [1] (1-6) इन आयतों का भावार्थ यह है कि जिस प्रकार सूर्य के विपरीत चाँद, तथा दिन के विपरीत रात है, इसी प्रकार पुण्य और पाप तथा इस संसार का प्रति एक दूसरा संसार परलोक भी है। और इन्हीं स्वभाविक लक्ष्यों से परलोक का विश्वास होता है।

Şems 91:7

और आत्मा की तथा उसके ठीक-ठाक बनाने की (क़सम)।

Şems 91:8

फिर उसके दिल में उसकी बुराई और उसकी परहेज़गारी (की समझ) डाल दी।[2] ——— [2] (7-8) इन आयतों में कहा गया है कि अल्लाह ने इनसान को शारीरिक और बौद्धिक शक्तियाँ देकर बस नहीं किया, बल्कि उसने पाप और पुण्य का स्वभाविक ज्ञान देकर नबियों को भी भेजा। और वह़्य (प्रकाशना) द्वारा पाप और पुण्य के सभी रूप समझा दिए। जिसकी अंतिम कड़ी क़ुरआन, और अंतिम नबी मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं।

Şems 91:9

निश्चय वह सफल हो गया, जिसने उसे पवित्र कर लिया।

Şems 91:10

तथा निश्चय वह विफल हो गया, जिसने उसे (पापों में) दबा दिया।[3] ——— [3] (9-10) इन दोनों आयतों में यह बताया जा रहा है कि अब भविष्य की सफलता और विफलता इस बात पर निर्भर है कि कौन अपनी स्वभाविक योग्यता का प्रयोग किसके लिए कितना करता है। और इस प्रकाशना : क़ुरआन के आदेशों को कितना मानता और पालन करता है।

Şems 91:11

समूद (की जाति) ने अपनी सरकशी के कारण झुठलाया।

Şems 91:12

जब उसका सबसे दुष्ट व्यक्ति उठ खड़ा हुआ।

Şems 91:13

तो अल्लाह के रसूल ने उनसे कहा : अल्लाह की ऊँटनी और उसके पीने की बारी का ध्यान रखो।

Şems 91:14

परंतु उन्होंने उसे झुठलाया और उस (ऊँटनी) की कूँचें काट दीं, तो उनके पालनहार ने उनके गुनाह के कारण उन्हें पीस कर विनष्ट कर दिया और उन्हें मटियामेट कर दिया।

Şems 91:15

और वह उसके परिणाम से नहीं डरता।[4] ——— [4] (11-15) इन आयतों में समूद जाति का ऐतिहासिक उदाहरण देकर दूतत्व (रिसालत) का महत्व समझाया गया है कि नबी इस लिए भेजा जाता है कि भलाई और बुराई का जो स्वभाविक ज्ञान अल्लाह ने इनसान के स्वभाव में रख दिया है उसे उभारने में उसकी सहायता करे। ऐसे ही एक नबी जिन का नाम सालेह था समूद की जाति की ओर भेजे गए। परंतु उन्होंने उनको नहीं माना, तो वे ध्वस्त कर दिए गए। उस समय मक्का के मूर्ति पूजकों की स्थिति समूद जाति से मिलती जुलती थी। इसलिए उनको सालेह नबी की कथा सुनाकर सचेत किया जा रहा है कि सावधान! कहीं तुम लोग भी समूद की तरह यातना में न घिर जाओ। वह तो हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की इस प्रार्थना के कारण बच गए कि ऐ अल्लाह! इन्हें नष्ट न कर। क्योंकि इन्हीं में से ऐसे लोग उठेंगे जो तेरे धर्म का प्रचार करेंगे। इसलिए कि अल्लाह ने आप सल्लल्लाहु अलैहि सल्लम को सारे संसारों के लिए दया बना कर भेजा था।

Leyl 92:1

रात की क़सम, जब वह छा जाए।

Leyl 92:2

और दिन की क़सम, जब वह रौशन हो जाए!

Leyl 92:3

तथा नर और मादा को पैदा करने की क़सम।

Leyl 92:4

निःसंदेह तुम्हारे प्रयास विविध हैं।[1] ——— [1] (1-4) इन आयतों का भावार्थ यह है कि जिस प्रकार रात-दिन तथा नर-मादा (स्त्री-पुरुष) भिन्न हैं, और उनके लक्षण और प्रभाव भी भिन्न हैं, इसी प्रकार मानवजाति (इनसान) के विश्वास, कर्म भी दो भिन्न प्रकार के हैं। और दोनों के प्रभाव और परिणाम भी विभिन्न हैं।

Leyl 92:5

फिर जिसने (दान) दिया और (अवज्ञा से) बचा।

Leyl 92:6

और सबसे अच्छी बात को सत्य माना।

Leyl 92:7

तो निश्चय हम उसके लिए भलाई को आसान कर देंगे।

Leyl 92:8

लेकिन वह (व्यक्ति) जिसने कंजूसी की और बेपरवाही बरती।

Leyl 92:9

और सबसे अच्छी बात को झुठलाया।

Leyl 92:10

तो हम उसके लिए कठिनाई (बुराई का मार्ग) आसान कर देंगे।[2] ——— [2] (5-10) इन आयतों में दोनों भिन्न कर्मों के प्रभाव का वर्णन है कि कोई अपना धन भलाई में लगाता है तथा अल्लाह से डरता है और भलाई को मानता है। सत्य आस्था, स्वभाव और सत्कर्म का पालन करता है। जिसका प्रभाव यह होता है कि अल्लाह उसके लिए सत्कर्मों का मार्ग सरल कर देता है। और उसमें पाप करने तथा स्वार्थ के लिए अवैध धन अर्जन की भावना नहीं रह जाती। ऐसे व्यक्ति के लिए दोनों लोक में सुख है। दूसरा वह होता है जो धन का लोभी, तथा अल्लाह से निश्न्तचिंत होता है और भलाई को नहीं मानता। जिसका प्रभाव यह होता है कि उसका स्वभाव ऐसा बन जाता है कि उसे बुराई का मार्ग सरल लगने लगता है। तथा अपने स्वार्थ और मनोकामना की पूर्ति के लिए प्रयास करता है। फिर इस बात को इस वाक्य पर समाप्त कर दिया गया है कि धन के लिए वह जान देता है, परंतु वह उसे अपने साथ लेकर नहीं जाएगा। फिर वह उसके किस काम आएगा?

Leyl 92:11

और जब वह (जहन्नम के गड्ढे में) गिरेगा, तो उसका धन उसके किसी काम नहीं आएगा।

Leyl 92:12

निःसंदेह हमारा ही ज़िम्मे मार्ग दिखाना है।

Leyl 92:13

निःसंदेह हमारे ही अधिकार में आख़िरत और दुनिया है।

Leyl 92:14

अतः मैंने तुम्हें भड़कती आग से सावधान कर दिया है।[3] ——— [3] (11-14) इन आयतों में मानवजाति (इनसान) को सावधान किया गया है कि अल्लाह का, दया और न्याय के कारण मात्र यह दायित्व था कि सत्य मार्ग दिखा दे। और क़ुरआन द्वारा उसने अपना यह दायित्व पूरा कर दिया। किसी को सत्य मार्ग पर लगा देना उसका दायित्व नहीं है। अब इस सीधी राह को अपनाओगे तो तुम्हारा ही भला होगा। अन्यथा याद रखो कि संसार और परलोक दोनों ही अल्लाह के अधिकार में हैं। न यहाँ कोई तुम्हें बचा सकता है, और न वहाँ कोई तुम्हारा सहायक होगा।

Leyl 92:15

जिसमें केवल सबसे बड़ा अभागा ही प्रवेश करेगा।

Leyl 92:16

जिसने झुठलाया तथा मुँह फेरा।

Leyl 92:17

और उससे उस व्यक्ति को बचा लिया जाएगा, जो सबसे ज़्यादा परहेज़गार है।

Leyl 92:18

जो अपना धन देता है, ताकि वह पवित्र हो जाए।

Leyl 92:19

और उसपर किसी का कोई उपकार नहीं है, जिसका बदला चुकाया जाए।

Leyl 92:20

वह तो केवल अपने सर्वोच्च रब का चेहरा चाहता है।

Leyl 92:21

और निश्चय वह (बंदा) प्रसन्न हो जाएगा।[4] ——— [4] (15-21) इन आयतों में यह वर्णन किया गया है कि कौन से कुकर्मी नरक में पड़ेंगे और कौन सुकर्मी उससे सुरक्षित रखे जाएँगे। और उन्हें क्या फल मिलेगा। आयत संख्या 10 के बारे में यह बात याद रखने की है कि अल्लाह ने सभी वस्तुओं और कर्मों का अपने नियमानुसार स्वभाविक प्रभाव रखा है। और क़ुरआन इसीलिए सभी कर्मों के स्वभाविक प्रभाव और फल को अल्लाह से जोड़ता है। और यूँ कहता है कि अल्लाह ने उसके लिए बुराई की राह सरल कर दी। कभी कहता है कि उनके दिलों पर मुहर लगा दी, जिसका अर्थ यह होता है कि यह अल्लाह के बनाए हुए नियमों के विरोध का स्वभाविक फल है। (देखिए : उम्मुल किताब, मौलाना आज़ाद)

Duhâ 93:1

कस़म है धूप चढ़ने के समय की!

Duhâ 93:2

और क़सम है रात की, जब वह छा जाए।

Duhâ 93:3

(ऐ नबी!) तेरे पालनहार ने तुझे न तो छोड़ा और न नाराज़ हुआ।

Duhâ 93:4

और निश्चित रूप से आख़िरत आपके लिए दुनिया से बेहतर है।

Duhâ 93:5

और निश्चय तेरा पालनहार तुझे प्रदान करेगा, तो तू प्रसन्न हो जाएगा।

Duhâ 93:6

क्या उसने आपको अनाथ पाकर शरण नहीं दी?

Duhâ 93:7

और आपको मार्ग से अनभिज्ञ पाया, तो सीधा मार्ग दिखाया।

Duhâ 93:8

और उसने आपको निर्धन पाया, तो संपन्न कर दिया।

Duhâ 93:9

अतः आप अनाथ पर कठोरता न दिखाएँ।[1] ——— [1] (1-9) इन आयतों में अल्लाह ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से फरमाया है कि तुम्हें यह चिंता कैसे हो गई है कि हम अप्रसन्न हो गए? हमने तो तुम्हारे जन्म के दिन से निरंतर तुमपर उपकार किए हैं। तुम अनाथ थे, तो तुम्हारे पालन और रक्षा की व्यवस्था की। राह से अंजान थे, तो राह दिखाई। निर्धन थे, तो धनी बना दिया। ये बातें बता रही हैं कि तुम आरंभ ही से हमारे प्रियवर हो और तुमपर हमारा उपकार निरंतर रहा है।

Duhâ 93:10

और माँगने वाले को न झिड़कें।

Duhâ 93:11

और अपने रब के उपकार का वर्णन करते रहें।[2] ——— [2] (10-11) इन अंतिम आयतों में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को बताया गया है कि हमने तुमपर जो उपकार किए हैं, उनके बदले में तुम अल्लाह की उत्पत्ति के साथ दया और उपकार करो यही हमारे उपकारों की कृतज्ञता होगी।

İnşirah 94:1

(ऐ नबी!) क्या हमने तुम्हारे लिए तुम्हारा सीना नहीं खोल दिया?

İnşirah 94:2

और हमने आपसे आपका बोझ उतार दिया।

İnşirah 94:3

जिसने आपकी कमर तोड़ दी थी।

İnşirah 94:4

और हमने आपके लिए आपका ज़िक्र ऊँचा कर दिया।[1] ——— [1] (1-4) इनका भावार्थ यह है कि हमने आपपर तीन ऐसे उपकार किए हैं जिनके होते आपको निराश होने की आवश्यक्ता नहीं। एक यह कि आपके सीने को खोल दिया, अर्थात आपमें स्थितियों का सामना करने का साहस पैदा कर दिया। दूसरा यह कि नबी होने से पहले जो आपके दिल में अपनी जाति की मूर्तिपूजा और सामाजिक अन्याय को देखकर चिंता और शोक का बोझ था जिसके कारण आप दुःखित रहा करते थे। इस्लाम का सत्य मार्ग दिखाकर उस बोझ को उतार दिया। क्योंकि यही चिंता आपकी कमर तोड़ रही थी। और तीसरा विशेष उपकार यह कि आपका नाम ऊँचा कर दिया। जिससे अधिक तो क्या आपके बराबर भी किसी का नाम इस संसार में नहीं लिया जा रहा है। यह भविष्यवाणी क़ुरआन शरीफ़ ने उस समय की जब एव व्यक्ति का विरोध उसकी पूरी जाति और समाज तथा उसका परिवार तक कर रहा था। और यह सोचा भी नहीं जा सकता था कि वह इतना बड़ा विश्व-विख्यात व्यक्ति हो सकता है। परंतु समस्त मानव संसार क़ुरआन की इस भविष्यवाणी के सत्य होने का साक्षी है। और इस संसार का कोई क्षण ऐसा नहीं गुज़रता जब इस संसार के किसी देश और क्षेत्र में अज़ानों में "अश्हदु अन्न मुह़म्मदर्-रसूलुल्लाह" की आवाज़ न गूँज रही हो। इसके सिवा भी पूरे विश्व में जितना आपका नाम लिया जा रहा है और जितना क़ुरआन का अध्ययन किया जा रहा है वह किसी व्यक्ति और किसी धर्म पुस्तक को प्राप्त नहीं, और यही अंतिम नबी और क़ुरआन के सत्य होने का साक्ष्य है। जिसपर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

İnşirah 94:5

निःसंदेह हर कठिनाई के साथ एक आसानी है।

İnşirah 94:6

निःसंदेह (उस) कठिनाई के साथ एक (और) आसानी है।[2] ——— [2] (5-6) इन आयतों में विश्व का पालनहार अपने बंदे (मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को विश्वास दिला रहा है कि उलझनों का यह समय देर तक नहीं रहेगा। इसी के साथ सरलता तथा सुविधा का समय भी लगा आ रहा है। अर्थात आपका आगामी युग, बीते युग से उत्तम होगा, जैसा कि "सूरतुज़-ज़ुह़ा" में कहा गया है।

İnşirah 94:7

अतः, जब आप फ़ारिग़ हो जाएँ, तो परिश्रम करें।

İnşirah 94:8

और अपने पालनहार की ओर अपना ध्यान लगाएँ।[3] ——— [3] (7-8) इन अंतिम आयतों में आपको निर्देश दिया गया है कि जब अवसर मिले, तो अल्लाह की उपासना में लग जाओ, और उसी में ध्यान मग्न हो जाओ, यही सफलता का मार्ग है।

Tin 95:1

क़सम है अंजीर की! तथा ज़ैतून की!

Tin 95:2

एवं "तूरे सीनीन" की क़सम!

Tin 95:3

और इस शान्ति वाले नगर की क़सम!

Tin 95:4

निःसंदेह हमने इनसान को सबसे अच्छी संरचना में पैदा किया है।

Tin 95:5

फिर हमने उसे सबसे नीची हालत की ओर लौटा दिया।

Tin 95:6

परंतु जो लोग ईमान लाए तथा उन्होंने सत्कर्म किए, उनके लिए समाप्त न होने वाला बदला है।

Tin 95:7

फिर (ऐ मनुष्य) तुझे कौन-सी चीज़ बदले (के दिन) को झुठलाने पर आमादा करती है?

Tin 95:8

क्या अल्लाह सब हाकिमों से बड़ा हाकिम नहीं है?

Alak 96:1

अपने पालनहार के नाम से पढ़, जिसने पैदा किया।

Alak 96:2

जिसने मनुष्य को रक्त के लोथड़े से पैदा किया।

Alak 96:3

पढ़ और तेरा पालनहार बड़े करम (उदारता) वाला है।

Alak 96:4

जिसने क़लम के द्वारा सिखाया।

Alak 96:5

उसने इनसान को वह सिखाया, जो वह नहीं जानता था।[1] ——— [1] (1-5) इन आयतों में प्रथम वह़्य (प्रकाशना) का वर्णन है। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) मक्का से कुछ दूर "जबल नूर" (ज्योति पर्वत) की एक गुफा में जिसका नाम "ह़िरा" है जाकर एकांत में अल्लाह को याद किया करते थे। और वहीं कई दिन तक रह जाते थे। एक दिन आप इसी गुफा में थे कि अकस्मात आपपर प्रथम वह़्य (प्रकाशना) लेकर फ़रिश्ता उतरा। और आपसे कहा : "पढ़ो"। आपने कहा : मैं पढ़ना नहीं जानता। इसपर फ़रिश्ते ने आपको अपने सीने से लगाकर दबाया। इसी प्रकार तीन बार किया और आपको पाँच आयतें सुनाईं। यह प्रथम प्रकाशना थी। अब आप मुह़म्मद पुत्र अब्दुल्लाह से मुह़म्मद रसूलुल्लाह होकर डरते-काँपते घर आए। इस समय आपकी आयु 40 वर्ष थी। घर आकर कहा कि मुझे चादर उढ़ा दो। जब कुछ शांत हुए तो अपनी पत्नी ख़दीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) को पूरी बात सुनाई। उन्होंने आपको सांत्वना दी और अपने चाचा के पुत्र "वरक़ा बिन नौफ़ल" के पास ले गईं जो ईसाई विद्वान थे। उन्होंने आपकी बात सुनकर कहा : यह वही फ़रिश्ता है जो मूसा (अलैहिस्सलाम) पर उतारा गया था। काश मैं तुम्हारी नुबुव्वत (दूतत्व) के समय शक्तिशाली युवक होता और उस समय तक जीवित रहता जब तुम्हारी जाति तुम्हें मक्का से निकाल देगी! आपने कहा : क्या लोग मुझे निकाल देंगे? वरक़ा ने कहा : कभी ऐसा नहीं हुआ कि जो आप लाए हैं, उससे शत्रुता न की गई हो। यदि मैंने आपका वह समय पाया, तो आपकी भरपूर सहायता करूँगा। परंतु कुछ ही समय गुज़रा था कि वरक़ा का देहाँत हो गया। और वह समय आया जब आपको 13 वर्ष बाद मक्का से निकाल दिया गया। और आप मदीना की ओर हिजरत (प्रस्थान) कर गए। (देखिए : इब्ने कसीर) आयत संख्या 1 से 5 तक निर्देश दिया गया है कि अपने पालनहार के नाम से उसके आदेश क़ुरआन का अध्ययन करो जिसने इनसान को रक्त के लोथड़े से बनाया। तो जिसने अपनी शक्ति और दक्षता से जीता जागता इनसान बना दिया, वह उसे पुनः जीवित कर देने की भी शक्ति रखता है। फिर ज्ञान अर्थात क़ुरआन प्रदान किए जाने की शुभ सूचना दी गई है।

Alak 96:6

कदापि नहीं, निःसंदेह मनुष्य सीमा पार कर जाता है।

Alak 96:7

इसलिए कि वह स्वयं को बेनियाज़ (धनवान्) देखता है।

Alak 96:8

निःसंदेह, तेरे पालनहार ही की ओर वापस लौटना है।[2] ——— [2] (6-8) इन आयतों में उनको धिक्कारा है जो धन के अभिमान में अल्लाह की अवज्ञा करते हैं और इस बात से निश्चिन्त हैं कि एक दिन उन्हें अपने कर्मों का जवाब देने के लिए अल्लाह के पास जाना भी है।

Alak 96:9

क्या आपने उस व्यक्ति को देखा, जो रोकता है।

Alak 96:10

एक बंदे को, जब वह नमाज़ अदा करता है।

Alak 96:11

क्या आपने देखा यदि वह सीधे मार्ग पर हो।

Alak 96:12

या अल्लाह से डरने का आदेश देता हो?

Alak 96:13

क्या आपने देखा यदि उसने झुठलाया तथा मुँह फेरा?[3] ——— [3] (9-13) इन आयतों में उनपर धिक्कार है जो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के विरोध पर तुल गए। और इस्लाम और मुसलमानों की राह में रुकावट डालते और नमाज़ से रोकते हैं।

Alak 96:14

क्या उसने नहीं जाना कि अल्लाह देख रहा है?

Alak 96:15

कदापि नहीं, निश्चय यदि वह नहीं माना, तो हम अवश्य उसे माथे की लट पकड़कर घसीटेंगे।

Alak 96:16

ऐसे माथे की लट जो झूठा और पापी है।

Alak 96:17

तो वह अपनी सभा को बुला ले।

Alak 96:18

हम भी जहन्नम के फ़रिश्तों को बुला लेंगे।[4] ——— [4] (14-18) इन आयतों में सत्य के विरोधी को दुष्परिणाम की चेतावनी है।

Alak 96:19

कदापि नहीं, आप उसकी बात न मानें, (बल्कि) सजदा करें और (अल्लाह के) निकट हो जाएँ।[5] ——— [5] (19) इस में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके माध्यम से साधारण मुसलमानों को निर्देश दिया गया है कि सहनशीलता के साथ किसी धमकी पर ध्यान न देते हुए नमाज़ अदा करते रहो ताकि इसके द्वारा तुम अल्लाह के समीप हो जाओ।

Kadr 97:1

निःसंदेह हमने इस (क़ुरआन) को क़द्र की रात (महिमा वाली रात) में उतारा।

Kadr 97:2

और आपको क्या मालूम कि क़द्र की रात क्या है?

Kadr 97:3

क़द्र की रात हज़ार महीनों से उत्तम है।[1] ——— [1] हज़ार मास से उत्तम होने का अर्थ यह कि इस शुभ रात्रि में इबादत की बहुत बड़ी प्रधानता है। अबू हुरैरह (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि जो व्यक्ति इस रात में ईमान (सत्य विश्वास) के साथ तथा पुण्य की निय्यत से इबादत करे, तो उसके सभी पहले के पाप क्षमा कर दिए जाते हैं। (देखिए : सह़ीह़ बुख़ारी, ह़दीस संख्या : 35, तथा सह़ीह़ मुस्लिम, ह़दीस संख्या : 760)

Kadr 97:4

उसमें फ़रिश्ते तथा रूह (जिबरील) अपने पालनहार की अनुमति से हर आदेश के साथ उतरते हैं।[2] ——— [2] 'रूह़' से अभिप्राय जिब्रील अलैहिस्सलाम हैं। उनकी प्रधानता के कारण सभी फ़रिश्तों से उनकी अलग चर्चा की गई है। और यह भी बताया गया है कि वे स्वयं नहीं बल्कि अपने पालनहार की आज्ञा से ही उतरते हैं।

Kadr 97:5

वह रात फ़ज्र उदय होने तक सर्वथा सलामती (शांति) है।[3] ——— [3] इसका अर्थ यह है कि संध्या से भोर तक यह रात्रि सर्वथा शुभ तथा शांतिमय होती है। सह़ीह़ ह़दीसों से स्पष्ट होता है कि यह शुभ रात्रि रमज़ान की अंतिम दस रातों में से कोई एक रात है। इसलिए हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इन दस रातों को अल्लाह की उपासना में बिताते थे।

Beyyine 98:1

किताब वालों और मुश्रिकों में से जिन लोगों ने कुफ़्र किया, वे (कुफ़्र से) बाज़ आने वाले नहीं थे, यहाँ तक कि उनके पास खुला प्रमाण आ जाए।

Beyyine 98:2

अल्लाह की ओर से एक रसूल, जो पवित्र ग्रंथ पढ़कर सुनाता है।

Beyyine 98:3

जिनमें सच्ची ख़बरें और ठीक आदेश अंकित हैं।[1] ——— [1] (1-3) इस सूरत में सर्व प्रथम यह बताया गया है कि इस पुस्तक के साथ एक रसूल (ईशदूत) भेजना क्यों आवश्यक था। इसका कारण यह है कि मानव संसार के आदि शास्त्र धारी (यहूद तथा ईसाई) हों या मिश्रणवादी, अधर्म की ऐसी स्थिति में फँसे हुए थे कि एक नबी के बिना उनका इस स्थिति से निकलना संभव नहीं था। इसलिए इस चीज़ की आवश्यकता आई कि एक रसूल भेजा जाए, जो स्वयं अपनी रिसालत (दूतत्व) का ज्वलंत प्रमाण हो। और सबके सामने अल्लाह की किताब को उसके सह़ीह़ रूप में प्रस्तुत करे जो असत्य के मिश्रण से पवित्र हो जिससे आदि धर्म शास्त्रों को लिप्त कर दिया गया है।

Beyyine 98:4

और जिन्हें किताब दी गई थी, वे अपने पास स्पष्ट प्रमाण आ जाने के बाद ही अलग-अलग हुए।[2] ——— [2] इसके बाद आदि धर्म शास्त्रों के अनुयायियों के कुटमार्ग का विवरण दिया गया है कि इसका कारण यह नहीं था कि अल्लाह ने उनको मार्ग दर्शन नहीं दिया। बल्कि वे अपने धर्म ग्रंथो में मन माना परिवर्तन करके स्वयं कुटमार्ग का कारण बन गए।

Beyyine 98:5

हालाँकि उन्हें केवल यही आदेश दिया गया था कि वे अल्लाह के लिए धर्म को विशुद्ध करते हुए, एकाग्र होकर, उसकी उपासना करें, तथा नमाज़ अदा करें और ज़कात दें और यही सीधा धर्म है।

Beyyine 98:6

निःसंदेह किताब वालों और मुश्रिकों में से जो लोग काफ़िर हो गए, वे सदा जहन्नम की आग में रहने वाले हैं, वही लोग सबसे बुरे प्राणी हैं।

Beyyine 98:7

निःसंदेह जो लोग ईमान लाए और उन्होंने सत्कर्म किए, वही लोग सबसे अच्छे प्राणी हैं।

Beyyine 98:8

उनका बदला उनके पालनहार के पास सदा रहने वाले बाग़ हैं, जिनके नीचे से नहरें बहती हैं। वे उनमें सदैव रहने वाले हैं। अल्लाह उनसे प्रसन्न हुआ और वे अल्लाह से प्रसन्न हुए। यह उसके लिए है, जो अपने पालनहार से डर गया।[3] ——— [3] (6-8) इन आयतों में साफ़-साफ़ कह दिया गया है कि जो अह्ले किताब और मूर्तियों के पुजारी इस रसूल को मानने से इनकार करेंगे, वे बहुत बुरे हैं। और उनका स्थान नरक है। उसी में वे सदा रहेंगे। और जो संसार में अल्लाह से डरते हुए जीवन निर्वाह करेंगे तथा विश्वास के साथ सदाचार करेंगे, तो वे सदा के स्वर्ग में रहेंगे। अल्लाह उनसे प्रसन्न हो गया, और वे अल्लाह से प्रसन्न हो गए।

Zilzal 99:1

जब धरती को पूरी तरह झंझोड़ दिया जाएगा।

Zilzal 99:2

तथा धरती अपने बोझ बाहर निकाल देगी।

Zilzal 99:3

और इनसान कहेगा कि इसे क्या हो गया?

Zilzal 99:4

उस दिन वह अपनी खबरें बयान करेगी।

Zilzal 99:5

क्योंकि तेरे पालनहार ने उसे इसका आदेश दिया होगा।

Zilzal 99:6

उस दिन लोग अलग-अलग होकर लौटेंगे, ताकि उन्हें उनके कर्म दिखाए जाएँ।[1] ——— [1] (1-6) इन आयतों में बताया गया है कि जब प्रलय (क़ियामत) का भूकंप आएगा, तो धरती के भीतर जो कुछ भी है, सब उगल कर बाहर फेंक देगी। यह सब कुछ ऐसे होगा कि जीवित होने के पश्चात् सभी को आश्चर्य होगा कि यह क्या हो रहा है? उस दिन यह निर्जीव धरती प्रत्येक व्यक्ति के कर्मों की गवाही देगी कि किसने क्या-क्या कर्म किए हैं। यद्पि अल्लाह सबके कर्मों को जानता है, फिर भी उसका निर्णय गवाहियों से प्रमाणित करके होगा।

Zilzal 99:7

तो जिसने एक कण के बराबर भी नेकी की होगी, उसे देख लेगा।

Zilzal 99:8

और जिसने एक कण के बराबर भी बुराई की होगी, उसे देख लेगा।[2] ——— [2] (7-8) इन आयतों का अर्थ यह है कि प्रत्येक व्यक्ति अकेला आएगा, परिवार और साथी सब बिखर जाएँगे। दूसरा अर्थ यह भी हो सकता है कि इस संसार में जो किसी भी युग में मरे थे सभी दलों में चले आ रहे होंगे, और सबको अपने किए हुए कर्म दिखाए जाएँगे। और कर्मानुसार पुण्य और पाप का बदला दिया जाएगा। और किसी का पुणय और पाप छिपा नहीं रहेगा।

Adiyat 100:1

क़सम है उन घोड़ों की, जो पेट से साँस की आवाज़ निकालते हुए डौड़ने वाले हैं!

Adiyat 100:2

फिर टाप मारकर चिंगारियाँ निकालने वाले घोड़ों की क़सम!

Adiyat 100:3

फिर सुबह के समय हमला करने वाले (घोड़ों) की क़सम!

Adiyat 100:4

फिर उससे धूल उड़ाते हैं।

Adiyat 100:5

फिर वे उसके साथ (दुश्मन की) सेना के बीच घुस जाते हैं।

Adiyat 100:6

निःसंदेह इनसान अपने पालनहार का बड़ा कृतघ्न (नाशुक्रा) है।

Adiyat 100:7

और निःसंदेह वह इसपर स्वयं गवाह है।[1] ——— [1] (1-7) इन आरंभिक आयतों में मानवजाति (इनसान) की कृतघ्नता का वर्णन किया गया है। जिसकी भूमिका के रूप में एक पशु की कृतज्ञता को शपथ स्वरूप उदाहरण के लिए प्रस्तुत किया गया है। जिसे इनसान पोसता है, और वह अपने स्वामी का इतना भक्त होता है कि उसे अपने ऊपर सवार करके नीचे ऊँचे मार्गों पर रात-दिन की परवाह किए बिना दौड़ता और अपनी जान जोखिम में डाल देता है। परंतु इनसान जिसे अल्लाह ने पैदा किया, समझबूझ दी और उसके जीवन यापन के सभी साधन बनाए, वह उसका उपकार नहीं मानता और जानबूझ कर उसकी अवज्ञा करता है, उसे इस पशु से सीख लेनी चाहिए।

Adiyat 100:8

और निःसंदेह वह धन के मोह में बड़ा सख़्त है।[2] ——— [2] इस आयत में उसकी कृतघ्नता का कारण बताया गया है कि जिस इनसान को सर्वाधिक प्रेम अल्लाह से होना चाहिए, वही अत्याधिक प्रेम धन से करता है।

Adiyat 100:9

तो क्या वह नहीं जानता, जब क़ब्रों में जो कुछ है, निकाल बाहर किया जाएगा?

Adiyat 100:10

और जो कुछ सीनों में है, वह प्रकट कर दिया जाएगा।[3] ——— [3] (9-10) इन आयतों में सावधान किया गया है कि सांसारिक जीवन के पश्चात एक दूसरा जीवन भी है तथा उसमें अल्लाह के सामने अपने कर्मों का उत्तर देना है, जो प्रत्येक के कर्मों का ही नहीं, उनके सीनों के भेदों को भी प्रकाश में ला कर दिखा देगा कि किसने अपने धन तथा बल का कुप्रयोग कर कृतघ्नता की है, और किसने कृतज्ञता की है। और प्रत्येक को उसका प्रतिकार भी देगा। अतः इनसान को धन के मोह में अंधा तथा अल्लाह का कृतघ्न नहीं होना चाहिए, और उसके सत्धर्म का पालन करना चाहिए।

Adiyat 100:11

निःसंदेह उनका पालनहार उस दिन उनके बारे में पूरी ख़बर रखने वाला है।[4] ——— [4] अर्थात वह सूचित होगा कि कौन क्या है, और किस प्रतिकार का भागी है?

Karia 101:1

वह खड़खड़ा देने वाली।

Karia 101:2

क्या है वह खड़खड़ा देने वाली?

Karia 101:3

और तुम क्या जानो कि वह खड़खड़ा देने वाली क्या है?[1] ——— [1] 'क़ारिअह' प्रलय ही का एक नाम है जो उसके समय की घोर दशा का चित्रण करता है। इसका शाब्दिक अर्थ द्वार खटखटाना है। जब कोई अतिथि अकस्मात रात में आता है तो उसे दरवाज़ा खटखटाने की आवश्यकता होती है। जिससे एक तो यह ज्ञात हुआ कि प्रलय अकस्मात होगी। और दूसरा यह ज्ञात हुआ कि वह कड़ी ध्वनि और भारी उथल-पुथल के साथ आएगी। इसे प्रश्नवाचक वाक्यों में दोहराना सावधान करने और उसकी गंभीरता को प्रस्तुत करने के लिए है।

Karia 101:4

जिस दिन लोग बिखरे हुए पतिंगों की तरह हो जाएँगे।

Karia 101:5

और पर्वत धुने हुए रंगीन ऊन की तरह हो जाएँगे।[2] ——— [2] (4-5) इन दोनों आयतों में उस स्थिति को दर्शाया गया है जो उस समय लोगों और पर्वतों की होगी।

Karia 101:6

तो जिसके पलड़े भारी हो गए,

Karia 101:7

तो वह संतोषजनक जीवन में होगा।

Karia 101:8

तथा जिसके पलड़े हल्के हो गए,

Karia 101:9

उसका ठिकाना 'हाविया' (गड्ढा) है।

Karia 101:10

और तुम क्या जानो कि वह ('हाविया') क्या है?

Karia 101:11

वह एक बहुत गर्म आग है।[3] ——— [3] (6-11) इन आयतों में यह बताया गया है कि प्रलय क्यों होगी? इसलिए कि इस संसार में जिसने भले बुरे कर्म किए हैं उनका प्रतिकार कर्मों के आधार पर दिया जाए, जिसका परिणाम यह होगा कि जिसने सत्य विश्वास के साथ सत्कर्म किया होगा, वह सुख का भागी होगा। और जिसने निर्मल परंपरागत रीतियों को मानकर कर्म किया होगा, वह नरक में झोंक दिया जाएगा।

Tekâsür 102:1

तुम्हें (धन, संतान की) बहुतायत पर गर्व ने ग़ाफ़िल कर दिया।

Tekâsür 102:2

यहाँ तक कि तुम क़ब्रिस्तान जा पहुँचे।[1] ——— [1] (1-2) इन दोनों आयतों में उनको सावधान किया गया है, जो सांसारिक धन ही को सब कुछ समझते हैं और उसे अधिकाधिक प्राप्त करने की धुन उनपर ऐसी सवार है कि मौत के पार क्या होगा, इसे सोचते ही नहीं। कुछ तो धन की देवी बनाकर उसे पूजते हैं।

Tekâsür 102:3

कदापि नहीं, तुम शीघ्र ही जान लोगे।

Tekâsür 102:4

फिर कदापि नहीं, तुम शीघ्र ही जान लोगे।

Tekâsür 102:5

कदापि नहीं, यदि तुम निश्चित ज्ञान के साथ जान लेते (तो ऐसा न करते)।[2] ——— [2] (3-5) इन आयतों में सावधान किया गया है कि मौत के पार क्या है? उन्हें आँख बंद करते ही इसका ज्ञान हो जाएगा। यदि आज तुम्हें इस का विश्वास होता, तो अपने भविष्य की ओर से निश्चिन्त न होते। और तुम पर धन प्राप्ति की धुन इतनी सवार न होती।

Tekâsür 102:6

निश्चय तुम अवश्य जहन्नम को देखोगे।

Tekâsür 102:7

फिर निश्चय तुम उसे अवश्य विश्वास की आँख से देखोगे।

Tekâsür 102:8

फिर निश्चय तुम उस दिन नेमतों के बारे में अवश्य पूछे जाओगे।[3] ——— [3] (6-8) इन आयतों में सूचित किया गया है कि तुम नरक के होने का विश्वास करो या न करो, वह दिन आकर रहेगा जब तुम उसको अपनी आँखों से देख लोगे। उस समय तुम्हें इसका पूरा विश्वास हो जाएगा। परंतु वह दिन कर्म का नहीं ह़िसाब देने का दिन होगा। और तुम्हें प्रत्येक अनुकंपा (नेमत) के बारे में अल्लाह के सामने जवाबदेही करनी होगी। (अह़्सनुल बयान)

Asr 103:1

अस्र के समय की क़सम!

Asr 103:2

निःसंदेह इनसान घाटे में है।[1] ——— [1] (1-2) 'अस्र' का अर्थ निचोड़ना है। युग तथा संध्या के समय के भाग के लिए भी इसका प्रयोग होता है। और यहाँ इसका अर्थ युग और दिन का अंतिम समय दोनों लिया जा सकता है। इस युग की गवाही इस बात पर पेश की गई है कि इनसान जब तक ईमान (सत्य विश्वास) के गुणों को नहीं अपनाता, विनाश से सुरक्षित नहीं रह सकता। इसलिए कि इनसान के पास सबसे मूल्यवान पूँजी समय है, जो तेज़ी से गुज़रता है। इसलिए यदि वह परलोक का सामान न करे, तो अवश्य क्षति में पड़ जाएगा।

Asr 103:3

सिवाय उन लोगों के जो ईमान लाए तथा उन्होंने सत्कर्म किए और एक-दूसरे को सत्य की ताकीद की और एक-दूसरे को धैर्य की ताकीद की।[2] ——— [2] इसका अर्थ यह है कि परलोक की क्षति से बचने के लिए मात्र ईमान ही पर बस नहीं, इसके लिए सदाचार भी आवश्यक है और उसमें से विशेष रूप से सत्य और सहनशीलता और दूसरों को इनकी शिक्षा देते रहना भी आवश्यक है। (तर्जुमानुल क़ुरआन, मौलाना आज़ाद)

Hümezeh 104:1

विनाश है प्रत्येक बहुत ग़ीबत करने वाले और बहुत दोष लगाने वाले के लिए।

Hümezeh 104:2

जिसने धन एकत्र किया और उसे गिन-गिन कर रखा।

Hümezeh 104:3

वह समझता है कि उसके धन ने उसे हमेशा रहने वाला बना दिया?[1] ——— [1] (1-3) इन आयतों में धन के पुजारियों के अपने धन के घमंड में दूसरों का अपमान करने और उनकी कृपणता (कंजूसी) का चित्रण किया गया है, उन्हें चेतावनी दी गई है कि यह आचरण विनाशकारी है, धन किसी को संसार में सदा जीवित नहीं रखेगा, एक समय आएगा कि उसे सब कुछ छोड़ कर ख़ाली हाथ जाना पड़ेगा।

Hümezeh 104:4

कदापि नहीं, वह अवश्य 'ह़ुतमा' में फेंका जाएगा।

Hümezeh 104:5

और तुम क्या जानो कि वह 'हुतमा' क्या है?

Hümezeh 104:6

वह अल्लाह की भड़काई हुई आग है।

Hümezeh 104:7

जो दिलों तक जा पहुँचेगी।

Hümezeh 104:8

निःसंदेह वह उनपर बंद कर दी जाएगी।

Hümezeh 104:9

लंबे-लंबे स्तंभों में।[2] ——— [2] (4-9) इन आयतों के अंदर परलोक में धन के पुजारियों के दुष्परिणाम से अवगत कराया गया है कि उनको अपमान के साथ नरक में फेंक दिया जाएगा। जो उन्हें खण्ड कर देगी और दिलों तक जो कुविचारों का केंद्र हैं पहुँच जाएगी, और उसमें इन अपराधियों को फेंककर ऊपर से बंद कर दिया जाएगा।

Fil 105:1

क्या तुमने नहीं देखा कि तुम्हारे पालनहार ने हाथी वालों के साथ किस तरह किया?

Fil 105:2

क्या उसने उनकी चाल को विफल नहीं कर दिया?

Fil 105:3

और उनपर झुंड के झुंड पक्षी भेजे।

Fil 105:4

जो उनपर पकी हुई मिट्टी (खंगर) की कंकड़ियाँ फेंक रहे थे।

Fil 105:5

तो उसने उन्हें खाए हुए भूसे की तरह कर दिया।[1] ——— [1] (1-5) इस सूरत का लक्ष्य यह बताना है कि काबा को आक्रमण से बचाने के लिए तुम्हारे देवी-देवता कुछ काम न आए। क़ुरैश के प्रमुखों ने अल्लाह ही से दुआ की थी और उनपर इसका इतना प्रभाव पड़ा था कि कई वर्षों तक साधारण नागरिकों तक ने भी अल्लाह के सिवा किसी की पूजा नहीं की थी। यह बात नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पैदाइश से कुछ पहले की थी और वहाँ बहुत सारे लोग अभी जीवित थे जिन्होंने यह चित्र अपने नेत्रों से देखा था। अतः उनसे यह कहा जा रहा है कि मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जो आमंत्रण दे रहे हैं वह यही तो है कि अल्लाह के सिवाय किसी की पूजा न की जाए, और इसको दबाने का परिणाम वही हो सकता है जो हाथी वालों का हुआ। (इब्ने कसीर)

Kureyş 106:1

क़ुरैश को मानूस कर देने के कारण।

Kureyş 106:2

उन्हें जाड़े तथा गर्मी की यात्रा से मानूस कर देने के कारण।[1] ——— [1] (1-2) गर्मी और जाड़े की यात्रा से अभिप्राय गर्मी के समय क़ुरैश की व्यपारिक यात्रा है, जो शाम और फ़लस्तीन की ओर होती थी। और जाड़े के समय वे दक्षिण अरब की यात्रा करते थे, जो गर्म क्षेत्र है।

Kureyş 106:3

अतः उन्हें चाहिए कि इस घर (काबा) के मालिक की इबादत करें।[2] ——— [2] इस घर से अभिप्राय काबा है। अर्थ यह है कि यह सुविधा उन्हें इसी घर के कारण प्राप्त हुई। और वह स्वयं यह मानते हैं कि 360 मूर्तियाँ उनकी रब नहीं हैं, जिनकी वे पूजा कर रहे हैं। उनका रब (पालनहार) वही है, जिसने उनको अबरहा के आक्रमण से बचाया। और उस युग में जब अरब की प्रत्येक दिशा में अशांति का राज्य था मात्र इसी घर के कारण इस नगर में शांति है। और तुम इसी घर के निवासी होने के कारण निश्चिंत होकर व्यापारिक यात्राएँ कर रहे हो, और सुख-सुविधा के साथ रहते हो। क्योंकि काबे के प्रबंधक और सेवक होने के कारण ही लोग क़ुरैश का आदर करते थे। तो उन्हें स्मरण कराया जा रहा है कि फिर तुम्हारा कर्तव्य है कि केवल उसी की उपासना करो।

Kureyş 106:4

जिसने उन्हें भूख में खिलाया तथा उन्हें भय से सुरक्षित किया।

Mâûn 107:1

(ऐ नबी!) क्या आपने उसे देखा, जो बदले के दिन को झुठलाता है?

Mâûn 107:2

तो यही है, जो अनाथ (यतीम) को धक्के देता है।

Mâûn 107:3

तथा ग़रीब को खाना खिलाने के लिए प्रोत्साहित नहीं करता है।[1] ——— [1] (2-3) इन आयतों में उन काफ़िरों (अधर्मियों) की दशा बताई गई है जो परलोक का इनकार करते थे।

Mâûn 107:4

तो विनाश है उन नमाज़ियों के लिए,[2] ——— [2] इन आयतों में उन मुनाफ़िक़ों की दशा का वर्णन किया गया है, जो ऊपर से मुसलमान हैं परंतु उनके दिलों में परलोक और प्रतिकार का विश्वास नहीं है। इन दोनों प्रकारों के आचरण और स्वभाव को बयान करने से अभिप्राय यह बताना है कि इनसान में सदाचार की भावना परलोक पर विश्वास के बिना उत्पन्न नहीं हो सकती। और इस्लाम परलोक का सह़ीह विश्वास देकर इनसानों में अनाथों और ग़रीबों की सहायता की भावना पैदा करता है और उसे उदार तथा परोपकारी बनाता है।

Mâûn 107:5

जो अपनी नमाज़ से लापरवाह हैं।

Mâûn 107:6

वे जो दिखावा करते हैं।

Mâûn 107:7

तथा साधारण बरतने की चीज़ भी माँगने से नहीं देते।[3] ——— [3] आयत संख्या 7 में मामूली चाज़ के लिए 'माऊन' शब्द का प्रयोग हुआ है। जिसका अर्थ है साधारण माँगने के सामान जैसे पानी, आग, नमक, डोल आदि। और आयत का अभिप्राय यह है कि आख़िरत का इनकार किसी व्यक्ति को इतना तंगदिल बना देता है कि वह साधारण उपकार के लिए भी तैयार नहीं होता।

Kevser 108:1

(ऐ नबी!) हमने आपको कौसर प्रदान किया है।[1] ——— [1] कौसर का अर्थ है बहुत ज़्यादा और अत्यधिक भलाई। और नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया कि कौसर एक ह़ौज़ (कुंड) है, जो मुझे परलोक में प्रदान किया जाएगा। जब प्रत्येक व्यक्ति प्यास-प्यास कर रहा होगा और आपकी उम्मत आपके पास आएगी, आप पहले ही से वहाँ उपस्थित होंगे और आप उन्हें उससे पिलाएँगे, जिसका जल दूध से उजला और मधु से अधिक मधुर होगा। उसकी भूमि कस्तूरी होगी, उसकी सीमा और बरतनों का सविस्तार वर्णन ह़दीसों में आया है।

Kevser 108:2

तो आप अपने पालनहार ही के लिए नमाज़ पढ़ें तथा क़ुर्बानी करें।[2] ——— [2] इस आयत में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) और आपके माध्यम से सभी मुसलमानों से कहा जा रहा है कि जब समस्त भलाइयाँ तुम्हारे पालनहार ही ने प्रदान की हैं, तो तुम भी मात्र उसी की पूजा करो और बलि भी उसी के लिए दो। मूर्तिपूजकों की भाँति देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना न करो और न उनके लिए बलि दो। वे तुम्हें कोई लाभ और हानि देने का सामर्थ्य नहीं रखते।

Kevser 108:3

निःसंदेह आपका शत्रु ही बे नाम व निशान है।[3] ——— [3] आयत संख्या 3 में 'अब्तर' का शब्द प्रयोग हुआ है। जिसका अर्थ है जड़ से अलग कर देना जिसके बाद कोई पेड़ सूख जाता है। और इस शब्द का प्रयोग उसके लिए भी किया जाता है जो अपनी जाति से अलग हो जाए, या जिसका कोई पुत्र जीवित न रह जाए, और उसके निधन के बाद उसका कोई नाम लेवा न हो। इस आयत में जो भविष्यवाणी की गई है, वह सत्य सिद्ध होकर पूरे मानव संसार को इस्लाम और क़ुरआन पर विचार करने के लिए बाध्य कर रही है। (इब्ने कसीर)

Kâfirun 109:1

(ऐ नबी!) आप कह दीजिए : ऐ काफ़िरो!

Kâfirun 109:2

मैं उसकी इबादत नहीं करता, जिसकी तुम इबादत करते हो।

Kâfirun 109:3

और न तुम उसकी इबादत करने वाले हो, जिसकी मैं इबादत करता हूँ।

Kâfirun 109:4

और न मैं उसकी इबादत करने वाला हूँ, जिसकी इबादत तुमने की है।

Kâfirun 109:5

और न तुम उसकी इबादत करने वाले हो, जिसकी मैं इबादत करता हूँ।

Kâfirun 109:6

तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म तथा मेरे लिए मेरा धर्म है।[1] ——— [1] (1-6) पूरी सूरत का भावार्थ यह है कि इस्लाम में वही ईमान (विश्वास) मान्य है, जो पूर्ण तौह़ीद (एकेश्वर्वाद) के साथ हो, अर्थात अल्लाह के अस्तित्व तथा गुणों और उसके अधिकारों में किसी को साझी न बनाया जाए। क़ुरआन की शिक्षानुसार जो अल्लाह को नहीं मानता, और जो मानता है परंतु उसके साथ देवी-देवताओं को भी मानात है, तो दोनों में कोई अंतर नहीं। उसके विशेष गुणों को किसी अन्य में मानना उसको न मानने ही के बराबर है और दोनों ही काफ़िर हैं। (देखिए : उम्मुल किताब, मौलाना आज़ाद)

Nasr 110:1

(ऐ नबी!) जब अल्लाह की सहायता एवं विजय आ जाए।

Nasr 110:2

और आप लोगों को देखें कि वे अल्लाह के धर्म में दल के दल प्रवेश कर रहे हैं।[1] ——— [1] (1-2) इसमें विजय का अर्थ वह निर्णायक विजय है, जिसके बाद कोई शक्ति इस्लाम का सामना करने के योग्य नहीं रह जाएगी। और यह स्थिति सन् 8 (हिज्री) की है जब मक्का विजय हो गया। अरब के कोने-कोने से प्रतिनिधि मंडल रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की सेवा में उपस्थित होकर इस्लाम लाने लगे। और सन् 10 (हिज्री) में जब आप 'ह़ज्जतुल वदाअ' (अर्थात अंतिम ह़ज्ज) के लिए गए, तो उस समय पूरा अरब इस्लाम के अधीन आ चुका था और देश में कोई मुश्रिक (मूर्तिपूजक) नहीं रह गया था।

Nasr 110:3

तो आप अपने पालनहार की प्रशंसा के साथ उसकी पवित्रता का वर्णन करें और उससे क्षमा माँगें, निःसंदेह वह बहुत तौबा क़बूल करने वाला है।[2] ——— [2] इस आयत में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से कहा गया है कि इतना बड़ा काम आपने अल्लाह की दया से पूरा किया है, इसके लिए उसकी प्रशंसा और पवित्रता का वर्णन तथा उसकी कृतज्ञता व्यक्त करें। इसमें सभी के लिए यह शिक्षा है कि कोई पुण्य कार्य अल्लाह की दया के बिना नहीं होता। इसलिए उसपर घमंड नहीं करना चाहिए।

Tebbet 111:1

अबू लहब के दोनों हाथ नाश हो जाएँ! और वह (स्वयं) विनष्ट हो गया।[1] ——— [1] अबू लहब का अर्थ शोला वाला है। वह अति सुंदर और गोरा था। उसका नाम वास्तव में 'अब्दुल उज़्ज़ा' था, अर्थात उज़्ज़ा का भक्त और दास। 'उज़्ज़ा' उनकी एक देवी का नाम था। परंतु वह अबू लहब के नाम से जाना जाता था। इसलिए क़ुरआन ने उसका यही नाम प्रयोग किया है और इसमें उसके नरक की ज्वाला में पड़ने का संकेत भी है।

Tebbet 111:2

उसका धन तथा जो कुछ उसने कमाया था, उसके काम नहीं आया।

Tebbet 111:3

जल्द ही वह लपट वाली आग में दाख़िल होगा।[2] ——— [2] (1-2) यह आयतें उसकी इस्लाम को दबाने की योजना के विफल हो जाने की भविष्यवाणी हैं। और संसार ने देखा कि अभी इन आयतों के उतरे कुछ वर्ष ही हुए थे कि 'बद्र' की लड़ाई में मक्के के बड़े-बड़े वीर प्रमुख मारे गए। और 'अबू लहब' को इस खबर से इतना दुःख हुआ कि उसके सातवें दिन मर गया। और मरा भी ऐसे कि उसे मलगिनानत पुसतुले (प्लेग जैसा कोई रोग) की बामारी लग गई। और छूत के भय से उसे अलग फेंक दिया गया। कोई उसके पास नहीं जाता था। मृत्यु के बाद भी तीन दिन तक उसका शव पड़ा रहा। और जब उसमें गंध होने लगी, तो उसे दूर से लकड़ी से एक गढ़े में डाल दिया गया। और ऊपर से मिट्टी और पत्थर डाल दिए गए। और क़ुरआन की यह भविष्यवाणी पूरी हुई। और जैसा कि आयत संख्या 2 में कहा गया उसका धन और उसकी कमाई उसके कुछ काम नहीं आई। उसकी कमाई से उद्देश्य अधिकतर भाष्यकारों ने 'उसकी संतान' लिया है। जैसा कि सह़ीह ह़दीसों में आया है कि तुम्हारी संतान तुम्हारी उत्तम कमाई है।

Tebbet 111:4

तथा उसकी पत्नी (भी जहन्नम में जाएगी), जो ईंधन उठाने वाली है।

Tebbet 111:5

उसकी गर्दन में मज़बूत बटी हुई रस्सी होगी।[3] ——— [3] (1-5) अबू लहब की पत्नी का नाम 'अरवा' था। और उस की उपाधि (कुन्नियत) 'उम्मे जमील' थी। आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की शत्रुता में किसी प्रकार कम न थी। लकड़ी लादने का अर्थ भाष्यकारों ने अनेक किया है। परंतु इसका अर्थ उसको अपमानित करना है। या पापों का बोझ लाद रखने के अर्थ में है। वह सोने का हार पहनती थी और 'लात' तथा 'उज़्ज़ा' की शपथ ले कर - ये दोनों उनकी देवियों के नाम हैं - कहा करती थी कि मुह़म्मद के विरोध में यह मूल्यवान हार भी बेचकर खर्च कर दूँगी। अतः यह कहा गया है कि आज तो वह एक धन्यवान व्यक्ति की पत्नी है। उसके गले में बहुमूल्य हार पड़ा हुआ है, परंतु आख़िरत में वह ईंधन ढोने वाली लौंडी की तरह होगी। गले में आभूषण के बदले बटी हुई मूँज की रस्सी पड़ी होगी। जैसी रस्सी ईंधन ढोने वाली लौंडियों के गले में पड़ी होती है। और इस्लाम का यह चमत्कार ही तो है कि जिस 'अबु लहब' और उसकी पत्नी ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से शत्रुता की, उन्हीं की औलाद 'उत्बा', 'मुअत्तब' तथा 'दुर्रह' ने इस्लमा स्वीकार कर लिया।

İhlas 112:1

(ऐ रसूल!) आप कह दीजिए : वह अल्लाह एक है।[1] ——— [1] आयत संख्या 1 में 'अह़द' शब्द का प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ है, उसके अस्तित्व एवं गुणों में कोई साझी नहीं है। यहाँ 'अह़द' शब्द का प्रयोग यह बताने के लिए किया गया है कि वह अकेला है। वह वृक्ष के समान एक नहीं है जिसकी अनेक शाखाएँ होती हैं। आयत संख्या 2 में 'समद' शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ है अब्रण होना। अर्थात जिसमें कोई छिद्र न हो जिससे कुछ निकले, या वह किसी से निकले। और आयत संख्या 3 इसी अर्थ की व्याख्या करती है कि न उसकी कोई संतान है और न वह किसी की संतान है।

İhlas 112:2

अल्लाह बेनियाज़ है।

İhlas 112:3

न उसकी कोई संतान है और न वह किसी की संतान है।

İhlas 112:4

और न कोई उसका समकक्ष है।[2] ——— [2] इस आयत में यह बताया गया है कि उसकी प्रतिमा तथा उसके बराबर और समतुल्य कोई नहीं है। उसके कर्म, गुण और अधिकार में कोई किसी रूप में बराबर नहीं। न उसकी कोई जाति है न परिवार। इन आयतों में क़ुरआन उन विषयों को जो लोगों के तौह़ीद से फिसलने का कारण बने, उसे अनेक रूप में वर्णित करता है। और देवियों और देवताओं के विवाहों और उन के पुत्र और पौत्रों का जो विवरण देव मालाओं में मिलता है, क़ुरआन ने उसका खंडन किया है।

Felak 113:1

(ऐ नबी!) कह दीजिए : मैं सुबह के पालनहार की शरण लेता हूँ।

Felak 113:2

उस चीज़ की बुराई से, जो उसने पैदा की।

Felak 113:3

तथा अंधेरी रात की बुराई से, जब वह छा जाए।[1] ——— [1] (1-3) इनमें संबोधित तो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को किया गया है, परंतु आपके माध्यम से पूरे मुसलमानों के लिए संबोधन है। शरण माँगने के लिए तीन बातें ज़रूरी हैं : (1) शरण माँगाना। (2) जो शरण माँगता हो। (3) जिसके भय से शरण माँगी जाती हो और अपने को उससे बचाने के लिए दूसरे की सुरक्षा और शरण में जाना चाहता हो। फिर शरण वही माँगता है, जो यह सोचता है कि वह स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सकता। और अपनी रक्षा के लिए वह ऐसे व्यक्ति या अस्तित्व की शरण लेता है जिसके बारे में उसका विश्वास होता है कि वह उसकी रक्षा कर सकता है। अब स्वभाविक नियमानुसार इस संसार में सुरक्षा किसी वस्तु या व्यक्ति से प्राप्त की जाती है, जैसे धूप से बचने के लिये पेड़ या भवन आदि की। परंतु एक खतरा वह भी होता है जिससे रक्षा के लिए किसी अनदेखी शक्ति से शरण माँगी जाती है, जो इस विश्व पर राज करती है। और वह उसकी रक्षा अवश्य कर सकती है। यही दूसरे प्रकार की शरण है, जो इन दोनों सूरतों में अभिप्रेत है। और क़ुरआन में जहाँ भी अल्लाह की शरण लेने की चर्चा है उसका अर्थ यही विशेष प्रकार की शरण है। और यह तौह़ीद पर विश्वास का अंश है। ऐसे ही शरण के लिए विश्वासहीन देवी-देवताओं इत्यादि को पुकारना शिर्क और घोर पापा है।

Felak 113:4

तथा गाँठों में फूँकने वालियों की बुराई से।

Felak 113:5

तथा ईर्ष्या करने वाले की बुराई से, जब वह ईर्ष्या करे।[2] ——— [2] (4-5) इन दोनों आयतों में जादू और हसद (ईर्ष्या) की बुराई से अल्लाह की शरण में आने की शिक्षा दी गई है। और हसद ऐसा रोग है जो किसी व्यक्ति को दूसरों को हानि पहुँचाने के लिए तैयार कर देता है। और आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर भी जादू, हसद ही के कारण किया गया था। यहाँ ज्ञातव्य है कि इस्लाम ने जादू को अधर्म कहा है जिससे इनसान के परलोक का विनाश हो जाता है।

Nas 114:1

(ऐ नबी!) कह दीजिए : मैं शरण लेता हूँ लोगों के पालनहार की।

Nas 114:2

लोगों के बादशाह की।

Nas 114:3

लोगों के सत्य पूज्य की।[1] ——— [1] (1-3) यहाँ अल्लाह को उसके तीन गुणों के साथ याद करके उसकी शरण लेने की शिक्षा दी गई है। एक उसका सब मानवजाति का पालनहार और स्वामी होना। दूसरे उसका सभी इनसानों का अधिपति और शासक होना। तीसरे उसका इनसानों का सत्य पूज्य होना। भावार्थ यह है कि (मैं) उस अल्लाह की शरण माँगता हूँ जो इनसानों का पालनहार, शासक और पूज्य होने के कारण उनपर पूरा नियंत्रण और अधिकार रखता है। जो वास्तव में, उस बुराई से इनसानों को बचा सकता है, जिससे वे स्वयं बचने और दूसरों को बचाने में अक्षम हैं, उसके सिवा कोई है भी नहीं जो शरण दे सकता हो।

Nas 114:4

वसवसा डालने वाले, पीछे हट जाने वाले की बुराई से।

Nas 114:5

जो लोगों के दिलों में वसवसे डालता है।

Nas 114:6

जिन्नों और इनसानों में से।[2] ——— [2] (4-6) आयत संख्या 4 में 'वसवास' शब्द का प्रयोग हुआ है। जिसका अर्थ है दिलों में ऐसी बुरी बातें डाल देना कि जिसके दिल में डाली जा रही हों उसे उसका ज्ञान भी न हो। और इसी प्रकार आयत संख्या 4 में 'ख़न्नास' का शब्द प्रयोग हुआ है। जिसका अर्थ है सुकड़ जाना, छुप जाना, पीछे हट जाना, धीरे-धीरे किसी को बुराई के लिए तैयार करना आदि। अर्थात दिलों में भ्रम डालने वाला, और सत्य के विरुद्ध मन में बुरी भावनाएँ उत्पन्न करने वाला। चाहे वह जिन्नों में से हो, अथवा मनुष्यों में से हो। इन सब की बुराइयों से हम अल्लाह की शरण लेते हैं, जो हमारा स्वामी और सच्चा पूज्य है।